गुंजन एक परी बनना चाहती थी, जो चंद-तारों की सैर कर सके।


राहुल कुमार जी का पूरा परिवार दिल्ली के पास साहिबाबाद में रहता था। उनके दो भाई और तीन बहने थी। उनकी और उनके सभी भाई बहनों की शादी भी उसी शहर में हुई थी। अतः हर परिवार के ननसाल-ददसाल, बच्चों-बुज़ुर्गो को मिला कर संख्या इस प्रकार थी – २८ बुज़ुर्ग, ४२ मध्य आयु वर्ग, ३० बालक-बालिकाओं का संघ।

चाँद तारों की परीराहुल कुमार के पिता-माता ने नियम बनाया – सब एक ही शहर में अपनी कोटि अनुसार अलग रहें। जिससे दुःख-सुख में पूरा साथ दें। लेकिन स्वयं अपना जीवन अपने नियमानुसार बिताये। राहुल की पत्नी के परिवार के साथ सभी भाई-बहनों के परिवार को यह बात समझ में आ गई।

समस्त परिवार के बीच एक और प्रस्ताव आया कि साल में दो छुट्टियां होने से संयुक्त रूप में सैर सपाटे का कार्यक्रम भी बनाया करें। सभी ने प्रस्ताव को सराहना दी। इस योजना का सबसे उत्तम फ़ायदा था – बुज़ुर्ग, मध्य आयु वर्ग और बालक श्रेणी को अलग-अलग स्थान में रूचि थी। किसी को पहाड़ी इलाका, किसी को समुन्द्र क्षेत्र, किसी को हरियाली जंगल, किसी को विकसित क्षेत्र जैसे मुंबई, हैदराबाद, कलकत्ता आदि। किसी को रेतीला इलाका राजस्थान पसंद था। भारत देश में विश्व की समस्त झलकियाँ दिख जाती हैं। साथ पौराणिक स्थान किले मंदिर आदि भी।

संयुक्त परिवार एक होने के कारण अलग-अलग स्थानों में जाने का निर्णय अलग-अलग परिवार के सदस्य ले लेते थे। सभी अपना खर्चा, अपनी तैयारी के साथ किसी भी परिवार के छोटे बच्चों को संभाल लेते थे। ये अद्भुद संगठन का प्रतीक था। इस परिवार में सबसे छोटी बेटी – गोल-मटोल बेहद खुश मिज़ाज़, गुंजन थी। सारा परिवार उसका बेहद ख्याल रखता था।

नई छुट्टी का भ्रमण कार्यक्रम निर्धारित हो रहा था – किस समूह को कहाँ जाने में दिलचस्पी है, किसे कहाँ। सब अपनी अपनी सलाह दे रहे थे।

छोटी बेटी गुंजन चुपचाप बैठी थी। हाथ में एक प्यारी सी कहानी की किताब थी। एक-एक करके सबने ही पूछा – अरे गुंजन रानी, गुंजन देवी, गुंजन प्रधान, गुंजन तितली, क्या हो गया? तुम क्यों नहीं बता रही हो कि इस बार कहाँ जाने का मन है?

गुंजन ने किताब खोली और तस्वीर दिखा कर बोली, “मुझे इस परी की तरह चाँद तारो के के बीच में घूमना है”।

Chand taaron ki pari

सभी ने ठहाका लगाया। लेकिन एक-एक करके सबने समझाया, “चाँद तारे तो रात में दिखते है। रात में तो हम लोग नहीं घूमते है”। “चाँद तारे तो सब जगह दिखते हैं। चाहे तुम किसी भी जगह भृमण करो”। “चाँद तारे तो घर में भी रोज़ दिखते है, आसमान में कैसे जा सकती हो?”

सबकी बात सुन कर भी गुंजन बोली, “मुझे तो इस परी की तरह घूमना है। चाँद तारे सब पास-पास हो और रात में जब भी आँख खोलो, चाँद तारे ही दिखे। उन्ही के साथ सो जाओ। तभी तो मैं परी बन कर घूमूंगी और खुश रहूंगी”।

सब एक दूसरे को देख कर सोचने लगे कि गुंजन महारानी को परी बन सैर करनी है, कैसे समझाएं?

उसकी माँ ने हाथ के इशारे से सबको शांत किया और भाव प्रकट किया कि उसके पास उपाय है।

माँ ने एक गहरी चादर पर चिपकू चाँद, ढेर सारे सितारे चिपका कर पूरा आसमान बना दिया। उसका गुणवत्ता स्वरुप था कि वो अन्धेरा होने पर चमकने लगते थे। चादर को गुंजन के बिस्तर के ऊपर फैला कर आसमान बना दिया। सभी को बेहद खुशी हुई की अब इस चादर के साथ गुंजन कहीं भी घूमने जा सकती है, क्योंकि उसे रात में चाँद तारो के साथ आधुनिक परी बन कर सोने को मिल जाएगा!

शब्दार्थ:

  • भ्रमण – सैर सपाटा
  • गुणवत्ता – उसकी पहचान
  • आधुनिक – वर्तमान

नैतिक मूल्य:

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