बुआ अपने बेटे वरेण्य के साथ जब गर्मियों की छुट्टी में अमरीका से भारत आया तो अनीशा और उज्ज्वल को खेलने के लिए एक और साथी मिल गया था। घर के आंगन में तीनों ही बच्चों ने उत्पात मचा दिया था। दादी-दादा भी बच्चों को मस्ती करते देख खूब आनंदित हो उठते। कभी तीनों बच्चे पकड़म पकड़ाई खेलते दिखते तो कभी साँप सीढ़ी। पूरे घर में रौनक हो गई थी।

एक दिन, वरेण्य अमरीका के खेलों के बारे में उज्ज्वल और अनीशा को बता रहा था, “वहाँ का राष्ट्रीय खेल बेस बॉल है तथा वहाँ बास्केट बॉल भी बहुत प्रचलित है”।

दादा जी बड़े ध्यान से वरेण्य की बात सुन रहे थे। जब उस बालक ने अपनी बात का अंत किया तब दादा जी उसके पास जाकर बैठ गए और कहा, “क्या तुम्हे पता है वरेण्य, भारत का राष्ट्रीय खेल हॉकी है, शतरंज का आविष्कार भारत में ही हुआ है”।

तीनो ही बालक बड़ी उत्सुकता से दादाजी को सुनने लगे। “सतोलिया (पिट्ठू), लंगड़ी टांग और कंचे भारत के प्राचीन खेल हैं”।

उज्ज्वल ने जिज्ञासा दिखाते हुए पूछा, “यह सभी खेल कैसे खेले जाते है दादू?”

Chalo khelein

दादाजी ने कहा, “लंगड़ी टांग में हम आठ खानों में एक से आँठ तक की गिनती लिखते हैं। पत्थर को एक टांग पर खड़े रहकर उन खानों में सरकाना पड़ता है, बिना लाइन को छुए । अंत में एक टांग पर खड़े रहकर इसे एक हाथ से बिना लाइन को छुए उठाना पड़ता है। सतोलिया (पिट्ठू) खेल में दो दल होते हैं और एक गेंद होती है। दल के सदस्य मनचाही संख्या में हो सकते हैं। एक दल का खिलाडी गेंद से पत्थरों को गिराता है और फिर उसके दल के सदस्यों को उन पत्थरों को फिर से जमाना पड़ता है और बोलना होता है ‘सतोलिया’। इस बीच दूसरे दल के ख़िलाड़ी गेंद से पहले दल के सदस्य को, जो पत्थरों को जमा रहा है, पीछे से मारते हैं। यदि वह गेंद सतोलिया बोलने से पहले टीम के सदस्य को लग जाती है तो दल बाहर हो जाता है। कितने भी लोग इस को खेल सकते हैं पर दोनों टीमों में  बराबर खिलाड़ी होने चाहिये। कंचा बहुत ही मज़ेदार खेल है। इसमें एक गड्ढा बनाया जाता है और उसमें कुछ दूरी से जहां एक रेखा खिंची होती है कंचे फेंके जाते हैं | जिसके सबसे अधिक कंचे गड्ढे में जाते हैं वह जीतता है। कुछ यूँ समझ लो कि यह आधुनिक समय में खेले जाने वाले बिलीअर्ड की तरह ही है”।

तीनो बच्चों ने एक स्वर में कहा, “अच्छा…”

दादाजी इसपर मुस्कुराये और बोले, “हाँ बच्चों, पहले समय में ऐसे ही अन्य और बहुत सारे मज़ेदार खेल खेले जाते थे जो अब इतने प्रसिद्ध न रहे। अपने पुराने दिनों की स्मृतियाँ को सोचकर मैं गुदगुदा उठता हूँ। कैसे मैं पूरा दिन अपने दोस्तों के साथ खेलों में उलझा रहता था। काश! वे दिन पुन: जीवित हो पाते”।

यह सुनकर अनीशा बोली, “तो क्या हुआ दादू, आप अब भी तो खेल सकते हैं। चलिये कंचे खेलते हैं”।

इसके बाद तीनों बच्चे दादा जी के साथ कंचे खरीदने गए।

शब्दार्थ:

  • प्रचलित – जो चलन में हो
  • जिज्ञासा – जानने की इच्छा
  • आधुनिक – नया
चलो खेलें
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