First published in November 2016 edition.


“घड़ी–घड़ी मेरा दिल धड़के…क्यों धड़के…”

रेडियो पर लता जी की मधुर आवाज गूंज रही थी और रेडियो को साफ करते रश्मि के हाथ ठिठक गए और उस मधुर आवाज के साथ जीवन की गहराइयों में खोती चली गई। अतीत की मधुर स्मृतियों की तरह बहुत दिनों बाद आज उसके होठों पर भी स्मित मुसकान तैर गई।

“माँ…माँ…माँ…”

“क्या है…क्या हो गया?”, तरुण की आवाज सुन कर वह लगभग दौड़ती हुई कमरे से बाहर आई।

“माँ बताओ तो मैं क्या लाया हूँ?”

“लाया होगा कोई नया कैसेट…और क्या!”

“नहीं माँ”

“तो फिर तेरी गर्ल फ्रेंड की चिट्ठी होगी”

“नहीं”

“मुझे नहीं मालूम”, उसने झुंझलाते हुए कहा।

“लास्ट चांस…एक बार और गेस करो”

तरुण शरारत से मुस्कराते हुए बोला और माँ को पकड़ कर सोफ़े पर बैठा दिया।

“तू मुझे छोड़…बहुत काम पड़ा है”, माँ ने नकली क्रोध दिखाते हुए कहा।

“सारे दिन काम…काम…काम…मेरी बात सुनने को समय ही नहीं है आपके पास”, वह मुंह फेर कर खड़ा हो गया।

“अब तू इतना बड़ा हो गया, माँ से भी रूठने लगा है”

“मैं नहीं बोलता आपसे”

“अच्छा दिखा न! मैं कब से बैठी हूँ”

“अच्छा! पहले आँखें बंद करो”

“ले भाई…कर ली आँखें बंद”

तरुण ने एक प्यारा सा छोटा सा डिब्बा सुंदर गिफ्ट पैक लिपटा हुआ उसके हाथ में रख दिया। रश्मि ने आश्चर्य से गिफ्ट देखा, फिर तरुण को देखा, आँखों से कौतूहल झांक रहा था (क्या लाया होगा उसका लाड़ला इकलौता बेटा)

“क्या है?”

“स्वयं देख लो”

उत्सुकता से रश्मि ने रिबन खोला, फिर एक के बाद एक कई पेपर उस पर से हटाए तब कहीं जाकर डिब्बे का असली रूप दिखा। एक बार फिर तरुण की ओर देखा। तरुण की नजरें माँ के चेहरे पर ही टिकी थीं, हर हाव भाव के साथ उसका दिल धड़क रहा था।

डिब्बा खुला, रश्मि ने बढ़ कर तरुण को चूम लिया। आँखों में अश्रु झिलमिलाने लगे।

“मेरे ओर से माँ को जन्म दिन का तोहफा भेंट किया जाता है। अब मलिकाए जन्नत बादशाह तरुण की अम्मीजान उसको स्वीकारने का ऐलान करें”, तरुण ने झुक कर मुगलिया तरीके से सलाम किया और झुक कर खड़ा हो गया।

रश्मि ने छलछलाती आँखों को पोंछा।

“माँ का जन्म दिन तुझे याद रहा”, आश्चर्य से पूछा रश्मि ने, क्योंकि आज से पहले न किसी ने उसका जन्म दिन मनाया न किसी ने तोहफा दिया। उसे खुद भी याद न था। भावातिरेक से वह चुप थी।

“क्या हुआ माँ! घड़ी पसंद नहीं आई”

“नहीं बेटा, यह तो बहुत सुंदर है। बहुत प्यारी है, मेरी वर्षों की तमन्ना है” चार बड़े भाई–बहन थे, गुजारा मुश्किल से होता था। एक घड़ी से ही सब काम चलाते थे, जिसकी परीक्षा होती उसी का हक उस पर हो जाता लेकिन जब एक साथ सबकी परीक्षाएँ होती तो वरिष्ठता के अनुसार घड़ी मिलती, इसलिए रश्मि का नंबर तो कभी आ ही नहीं पाता था। शादी के बाद मूल जरूरतें पूर्ण करने में वह भूल ही गई थी कि यह भी कभी उसकी मूल जरूरत थी। इच्छाएँ धीरे–धीरे कुंठित होती गई और जब से तरुण जिंदगी में आया तब से उसी के इर्द–गिर्द उसकी इच्छाएँ भी घूमने लगी।

ghadi

आज तरुण ने उस दबे शोले को हवा दे दी थी। रश्मि बार–बार अश्रुओं से ठंडा कर रही थी। वह इच्छा अब वात्सल्य प्रेम बन कर बह रही थी और माँ–बेटे उस प्रेम में आकंठ डूब रहे थे। माँ और पुत्र ऐसे एक दूसरे को थामे निहार रहे थे कि सिर्फ घड़ी की टिक–टिक सुनाई दे रही थी।

“तूने इतने पैसे क्यों खर्च किए?”

“माँ की खुशी के सामने पैसों की क्या कीमत है?”

“लेकिन इतने पैसे, कहाँ से आए तेरे पास?”

“बस….आ गए”

“कहाँ से?”

“बहुत दिनों से जोड़ रहा था, अपनी पॉकेटमनी से”

“अरे पगले! तू अपने लिए कुछ ले आता”

“तुम तो मेरी माँ हो, मेरे लिए आपसे ज्यादा कोई है ही नहीं”

“चल हट”, माँ ने डांटा। तरुण ने बढ़ कर माँ की कलाई पर घड़ी बांध दी।

“माँ अब मुझे जगाने में देर तो नहीं करोगी न!”

“नहीं, मेरे आका…बिलकुल नहीं”, दोनों खिलखिला कर हंसने लगे।

घड़ी की हर पल खिसकती सुई की तरह समय निरंतर आगे बढ़ता रहा। तरुण आठवीं कक्षा में आ गया था। अर्द्ध वार्षिक परीक्षा होने वाली थीं, नवंबर का महीना था। सर्दी का आगमन हो चुका था। रश्मि उसी के लिए सुबह–सुबह पानी गरम करने रख गई थी, इमर्शन रोड लगा कर। जल्दी से जाकर टिफिन तैयार किया और फिर तरुण को आवाज दी, “चलो जल्दी नहाओ…देर हो जाएगी”। खुद पानी देखने लगी कि पानी गरम हुआ या नहीं…

धड़ाम की आवाज सुन कर तरुण बाथ रूम की ओर दौड़ा तो माँ को जमीन पर पड़ा पाया। दौड़ कर मेन स्विच बंद किया। बिजली के एक झटके ने रश्मि के सभी सांसरिक बंधनों को तोड़ दिया, रश्मि निर्जीव पड़ी थी। उसकी धड़कनों के साथ जैसे तरुण की जिंदगी भी रुक गई। बहता दरिया अचानक थम गया। जिंदगी की बहार जैसे पतझड़ में बदल गई। पता नहीं क्या–क्या बदला लेकिन तरुण थम गया। हर समय आँखें कुछ तलाशती रहती, वह कुछ खोजता सा रहता। कभी जड़वत हो घर में पड़ा रहता। पिता के बार–बार कहने पर भी बाहर न निकलता और कभी कई–कई दिनों तक बाहर ही रहता, घर न आता। पिता–पुत्र एक दूसरे का सामना करने से कतराते। माँ को वह कभी–कभी पिता में पाना चाहता लेकिन पिता शायद रश्मि को उसी में देखना चाहता जो उन्हें सांत्वना दे, आगे बढ़ने की हिम्मत दे। नतीजा… दोनों एक दूसरे से दूर होते चले गए क्योकि बांधने वाली डोर टूट चुकी थी।

किशोरावस्था की विद्रोही उम्र, संवेदना और संवेगों का आधारहीन परिवेश, सहानुभूति एवं सहारा खोजती आँखें, अनिश्चित भविष्य, असुरक्षा की भावना, इन सबने तरुण को जिद्दी, भावुक और बात–बात में उत्तेजित होने वाला बना दिया। सब से उसे उपेक्षा मिलती, कोई उसे समझने का प्रयत्न न करता। ऐसे ही हालातों में एक दिन पिता ने बताया कि वह कल कोर्ट में शादी कर रहे हैं इसलिए वह कल घर पर ही रहे।

तरुण को लगा जैसे बॉम्ब ही उस पर गिर गया हो। काश! ऐसा  हुआ होता तो उसकी समस्याएँ भी समाप्त हो जाती और वह भी, लेकिन ऐसा कुछ भी न हुआ। वह भी रहा और समस्याएँ भी सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती चली गईं। वह निर्विकार भाव से पिता को देखता रहा फिर पैर पटकता कमरे में चला गया, न सहमति ही दी न असहमति ही। विद्रोह की भावना ही अधिक उसके मन में उभरती लेकिन पत्थरों के बीच निकलते पानी के स्रोत की तरह एक क्षीण सी भावना हृदय को शीतलता प्रदान करती कि शायद यह घर फिर से घर बन जाए। माँ के जाने के बाद जो वीरानगी उस पर छाई है, वह शायद हरीतिमा में बदल जाए।

पिता ने दूसरे दिन कई बार याद दिलाया कि दो बजे कोर्ट चलना है लेकिन तरुण बिना कुछ खाए–पिए घर से निकल गया। पिता इंतजार करते रहे लेकिन तरुण न आया। थक हार कर उदास मन से वह कोर्ट गए और चार बजे तक सगृहणी वापस आ गए। रिश्तेदारों के नाम पर दो–चार लोग थे। तरुण की अनुपस्थिति सबको खल रही थी। कोई भी इस मौके पर इस विषय को नहीं छेड़ना चाहता था।

तरुण ने तीन दिन बाद घर में प्रवेश किया। पिता अखबार पढ़ रहे थे, उसे देख कर अखबार चेहरे के सामने कर लिया। उसने भी अनदेखा किया और कदम बढ़ाया ही था कि एक मृदु आवाज कानों में पड़ी…

“आओ बेटे…चाय पियो…मैं कब से तुम्हारा इंतजार कर रही थी”

आश्चर्य से तरुण ने उसकी ओर देखा और एक कप उठा कर चुसकियाँ लेने लगा। पिता ने एक नजर उस पर डाली – उलझे बाल, रूखा चेहरा, आँखों के नीचे की कालिमा एवं सूखे होंठ उसके विगत समय के साक्षी थे।

“कहाँ थे अभी तक?”

“…………….”

“बोलते क्यों नहीं?”

“……………..”

“अपना भला चाहते हो तो ठीक से रहो…”

तरुण चुपचाप कमरे में चला गया। कमरा साफ सुथरा था। हर चीज करीने से लगी थी। बिखरी पुस्तकें न थी। मेज पर हर पुस्तक यथा स्थान थी। कपड़े साफ थे, इधर–उधर न पड़े थे। बैड पर धुली चादर थी। वह बिस्तर पर गिर पड़ा, तकिये पर एक–दो फिर अनेक बूंदे गिरने लगी। पता नहीं वे पश्चाताप के आंसू थे…या दुख के…या सुख के।

तरुण के पिता रवीन्द्र के जीवन में बहार आ गई। घर की चिंताओं से वे मुक्त हो गए थे। तरुण की दिनचर्या में भी बदलाव आने लगा था लेकिन तरुण का किशोर विद्रोही मन समझौता करने के लिए तैयार न था। यदा कदा मद्दिम पड़ी चिनगारियों की तरह भड़क उठता था और उसकी लपेट में घर की सुख–शांति भी ले लेता था। एक दिन रवीन्द्र और उमा कुछ शॉपिंग करके लौटे थे। वे सामान रख ही रहे थे कि तरुण आ गया। तरुण के लिए भी कपड़े और अन्य सामान भी थे। उमा उसे दिखाने लगी, यकायक तरुण की निगाह उमा की कलाई पर पड़ी। वहाँ छोटी सी घड़ी शोभायमान थी। तरुण का चेहरा तमतमा गया, क्रोध से आंखे लाल हो गई, नथने फूलने लगे, हाथ काँपने लगे, वह तन कर खड़ा हो गया, फिर एक ही झटके से घड़ी छीन ली। उमा हककी–बक्की सी खड़ी रह गई। रवीन्द्र ने आव देखा न ताव बेटे को थप्पड़ जड़ दिया। रवीन्द्र चिल्लाया –

“वापस करो घड़ी…”

“नहीं करूंगा”

“मैं कहता हूँ वापस करो…”

“नहीं करूंगा…”

रवीन्द्र ने उससे घड़ी छीननी चाही लेकिन तरुण ने उसे ज़ोर से धक्का मार दिया। वह दीवार से टकराया और दूसरे ही क्षण जमीन पर जा गिरा। तरुण घबरा गया।

वह बेतहाशा भागे जा रहा था…भागे जा रहा था…थक कर गिर गया तो हाथ से छूट कर घड़ी भी गिर गई…वह देख रहा था…सुन भी रहा था…टिक…टिक…टिक। उसे लगा जैसे माँ कह रही है, “जीवन में न सिर्फ समय का ध्यान रखो बल्कि हर घड़ी उचित–अनुचित का विचार कर काम करो, अन्यथा कोई भी घड़ी जीवन की बुरी घड़ी हो सकती है”

उसने घड़ी को सीने से लगा लिया और बुदबुदा उठा, “मुझे क्षमा कर दो माँ…सिर्फ एक बार…सिर्फ एक बार…”

शब्द – अर्थ

  • बुदबुदाना – धीरे –धीरे बोलना
  • शोभायमान – शोभा बढ़ाना
  • चुस्कियां लेना – धीरे धीरे पीना
Background music: Sunset (Kai Engel) / CC BY 4.0
घड़ी
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