चंदा रूठा-रूठा सा आज, क्योंकि रहना है उसको गोल-मटोल, वह कहता यह बार-बार सूरज नहीं बदलता जब, तारें भी न छोड़े अपना आकार, फिर मैं क्यों नहीं रहता एक समान? बहुत हो चुका यह छोटे-बड़े, और ग़ायब होने का खेल,…

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गोल-मटोल चंदा
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