“माँ! आज रात मुझे कहानी सुनाओगी न!”

ख़ुशी को रात को सोने से पहले कहानी सुनने का बहुत शौक है। वह कक्षा चार में पढ़ती है।

“हाँ बेटा! अभी कुछ देर रुको। मैं रसोई का काम ख़त्म करके जल्दी ही आती हूँ।”

ख़ुशी ने जल्दी से नाईट सूट पहना और अपने पलंग पर आकर लेट गई।

थोड़ी देर में माँ का काम ख़त्म हुआ तो वो भी उसके पास आ कर लेट गईं और बोलीं, “हाँ! अब बताओ कौन सी कहानी सुनाऊँ आज?”

“माँ, आज वो परियों वाली कहानी सुनाओ न,” ख़ुशी को परियों की कहानी सुनना बहुत पसंद है। वह हर तीसरे दिन कोई न कोई परियों वाली ही कहानी सुनना चाहती है।

“अच्छा चलो, आज मैं तुम्हें गुलाबी परी की कहानी सुनाती हूँ,” माँ ने कहानी शुरू की –

“बहुत समय पहले की बात है, परीलोक में बहुत सारी परियाँ रहती थीं। उनमें से गुलाबी परी सबसे प्यारी थी। वह रानी परी की सबसे चहेती परी भी थी। गुलाबी परी यदि कोई इच्छा करती तो वह उसे ज़रूर पूरा करती।

एक दिन खेलते–खेलते गुलाबी परी के मन में आया कि क्यों न पृथ्वीलोक पर सैर के लिए जाया जाए। उसने पृथ्वीलोक और वहां के लोगों के बारे में बहुत सुना हुआ था। वे लोग कैसे रहते हैं, वह जानना चाहती थी। उसने अपनी यह इच्छा रानी परी के सामने रखी। पहले तो रानी परी ने ना-नुकुर किया फिर मान गई। आखिर वह गुलाबी परी की इच्छा को कैसे टाल सकती थी।

रानी परी ने कहा, “पर मेरी एक शर्त है। पृथ्वीलोक पर तुम सिर्फ रात में ही जा सकती हो। और सूरज की पहली किरण निकलने से पहले ही तुम्हें वापस आना होगा। सूरज की किरणें तुम्हारे ऊपर नहीं पड़नी चाहिए। नहीं तो तुम्हारे पंख पिघल जाएंगे और तुम वापस नहीं आ पाओगी। तुम्हें हमेशा के लिए मनुष्यों के साथ रहना पड़ेगा।”

“ठीक है!” गुलाबी परी ने जल्दी से कहा। वह तो पृथ्वीलोक पर जाने के नाम से ही उत्साहित थी।

“लेकिन तुम अकेले नहीं जाओगी। तुम्हारे साथ तुम्हारी तीन और परी बहनें भी तुम्हारी सुरक्षा के लिए जाएंगी। सब्ज़ परी, नील परी और लाल परी,” रानी परी ने कहा।

गुलाबी परी और भी खुश हो गई। “ये सब तो मेरी सहेलियाँ हैं! अब तो और भी मज़ा आएगा। हम सब वहाँ जा कर मज़े करेंगे, किसी बाग़ में खेलेंगे और नृत्य करेंगे।” बाक़ी परियाँ भी बहुत खुश हो गईं, आखिर उनको भी पृथ्वीलोक पर जाने का मौका मिल रहा था। वे सब रात का बेसब्री से इंतज़ार करने लगीं।

जैसे ही पृथ्वीलोक पर अँधेरा छाया, चारों परियाँ तैयार हो गईं। रानी परी ने एक बार फिर से अपनी चेतावनी दोहराई, “याद रहे, सूरज की पहली किरण निकलने से पहले ही परीलोक वापस आना होगा।” फिर रानी माँ ने सभी परियों को आँखें बंद करने को कहा।

थोड़ी देर बाद जब चारों परियों ने आँखें खोलीं तो वे सब एक हरे भरे बाग़ में थीं। चारों तरफ सुन्दर-सुन्दर फूल खिले हुए थे। तितलियाँ फूलों पर मंडरा रहीं थीं। हवा में ठंडक थी। उन परियों को ये हरियाली इतनी अच्छी लगी कि उन्होंने नाचना शुरू कर दिया। धीमा-धीमा संगीत न जाने कहाँ से आ रहा था।”

gulaabi pari

खुशी की जब आँख खुली तो उसे कुछ संगीत की आवाज़ कहीं दूर से आती हुई प्रतीत हुई। जब संगीत की आवाज़ आना बंद नहीं हुई तो वो धीरे से अपने बिस्तर से उतरी और जाकर अपने कमरे की खिड़की खोली, “अरे! ये क्या! ये तो परियाँ हमारे ही बाग़ में हैं।” खुशी को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। उसने अपनी आँखें मलीं “नहीं! ये सच है! ये तो सचमुच परियाँ ही हैं। ओह! ये गुलाबी परी कितनी सुन्दर है।” इसके गुलाबी पंख कितने सुन्दर हैं।” गुलाबी परी ने एक बहुत सुन्दर गुलाबी रंग का गाउन पहना हुआ था। उसके सर पर एक छोटा सा मुकुट था जिसमें गुलाबी पत्थर जड़े हुए थे। उसके पंखों में से भी गुलाबी आभा आ रही थी।

चारों तरफ एक मद्धिम, नीले रंग का प्रकाश फैला हुआ था। छोटी-छोटी चमकती हुई किरणें, चारों तरफ फ़ैल गईं। भीनी-भीनी खुश्बू जैसे परियों में से ही आ रही थी। एक स्वप्निल सा वातावरण था। मधुर सा संगीत न जाने किस जादू से सुनाई दे रहा था। गुलाबी परी बीच में मगन हो नृत्य कर रही थी। बाकी तीनों परियाँ भी उसके चारों ओर नाच रहीं थीं।

उन्हें ये भी भान नहीं था कि दो नन्हीं आँखें उन्हें सम्मोहित हो कर देख रहीं हैं।

ये ख़ुशी ही थी जिसके घर के आँगन में परियाँ उतरीं थीं। खुशी के कमरे से बाग़ का सारा दृश्य दिखाई देता था। जो वह माँ से कहानियों में सुनती आई थी। आज वह सब कुछ अपनी आँखों से देख रही थी।

परियों को साक्षात अपने बाग़ में नाचते हुए देख वह मंत्रमुग्ध हो गई।

“अरे यहाँ तो सब्ज़ परी, लाल परी और नील परी भी हैं,” ख़ुशी की नज़र उन पर गई। उनके वस्त्र, पंख और मुकुट भी हरे, लाल और नीले थे, उतने ही सुन्दर जैसे कि गुलाबी परी के थे।

ख़ुशी परियों के नृत्य में जैसे खो सी गई। कितना समय बीत गया पता ही नहीं चला।

“खुशी! बेटा, उठो! स्कूल जाने का समय हो गया,” उसके कानों में माँ की आवाज़ पड़ी तो वह चौंक कर बिस्तर पर बैठ गई।

“अरे! मैं क्या सपना देख रही थी?” खुशी ने सोचा। ये तो सपना ही था। मैं तो सो कर उठी हूँ। मम्मी की कहानी कब ख़तम हुई और मैं कब सो गई पता ही नहीं चला। और कहानी की परियों को सपने में देखने लगी।

बिस्तर से उतर कर वह खिड़की पर खड़ी होकर बाग़ की तरफ देखने लगी। तभी उसकी नज़र गुलाब के पौधे के पास गई जहाँ कोई चीज़ चमकती हुई दिखाई दे रही थी। खुशी दौड़ कर बाग़ में गई।

“ये क्या है?” घास में एक चमकीला सा सितारा पड़ा हुआ था।

ये तो गुलाबी परी के पंखों में लगा था,” खुशी को याद आया। “तो क्या परियाँ सच में मेरे बाग़ में आईं थीं?” ख़ुशी की प्रसन्नत्ता का ठिकाना न रहा। उसने सितारे को उठाया और घर के अन्दर लाकर अपने बैग में रख लिया और स्कूल जाने के लिए तैयार होने लगी।

शब्दार्थ

  • सब्ज़ – हरा
  • ना-नुकुर – बहानेबाजी
  • स्वप्निल – सपने जैसा
गुलाबी परी
Average rating of 4.4 from 51 votes

Leave a Reply

Loading...