रमन को गुरुदक्षिणा पर एकाँकी लिखनी थी। उसने सोचा की एकलव्य की कहानी को छोड़कर, किसी दूसरी कहानी पर लिखा जाये।


रमन उत्साहित होने के साथ साथ थोड़ा चिन्तित भी था। विद्यालय में एकांकी लेखन प्रतियोगिता का विषय था – गुरुदक्षिणा। श्रेष्ठ एकांकी का मंचन वार्षिकोत्सव में किया जायेगा। वह जानता था कि गुरु द्रोणाचार्य और एकलव्य की कहानी में नयापन लाना बहुत मुश्किल है। फिर सभी छात्र उसी पर लिखेंगे। वह कुछ नया लिखना चाहता था। इसीलिए वह चिंतित था।

नयेपन की तलाश में वह अपनी दादी के पास गया। उनके पास पौराणिक एवं ऐतिहासिक कथाओं का भण्डार था।

उसकी समस्या सुनकर हँसते हुए दादी ने कहा, “अरे! इतनी सी बात है! हमारे इतिहास-पुराण और साहित्य में गुरुदक्षिणा पर एक से बढ़कर एक आख्यान है। तुम कोई भी विषय ले सकते हो। पर सबसे पहले तुम मुझे यह बताओ कि गुरुदक्षिणा का अर्थ तुम क्या समझते हो?”

रमन ने उत्तर दिया, “टीचर कुछ माँगता है और छात्र को देना पड़ता है। नहीं देने पर उसे श्राप लगा जाता है और उसकी पढ़ाई लिखाई बेकार हो जाती है”।

दादी ने हँसकर कहा, “चलो मैं पहले तुम्हें इसका अर्थ समझाती हूँ। बेटा रमन, गुरु शब्द में ‘गु’ का अर्थ है ‘अन्धकार’, यानी अज्ञान। और ‘रु’ का अर्थ है ‘प्रकाश’, यानी ज्ञान। इस प्रकार गुरु शब्द का अर्थ हुआ – अज्ञान रुपी अन्धकार को नष्ट करके जो ज्ञान रुपी प्रकाश दे, वह गुरु है और गुरु से प्राप्त ज्ञान के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन के लिए गुरु को कुछ अर्पित करना गुरुदक्षिणा है। गुरुदक्षिणा में कोई शर्त नहीं होती, अर्थात् गुरुदक्षिणा शिष्य की श्रद्धा और सामर्थ्य का विषय है। प्राचीन समय में नगर से दूर शान्त प्रकृति की गोद में गुरुकुल होते थे। राजपरिवार से लेकर सामान्य वर्ग के छात्र विद्या ग्रहण करते थे। शिक्षा पूरी हो जाने पर विधिपूर्वक दीक्षान्त समारोह होता था, जिसमें गुरु अपने शिष्यों को समाज के साथ सामंजस्य स्थापित करने के लिये उपयोगी उपदेश देता था। यह परम्परा आज भी विश्वविद्यालयों के दीक्षांत समारोह में प्रचालित है। शिष्य गुरुकुल छोड़ते समय अपनी सामर्थ्य के अनुसार गुरुवार को उपहार देते थे। कुछ शिष्य गुरुदक्षिणा में गुरु से प्राप्त ज्ञान का प्रचार एवं प्रसार तथा उसका सही उपयोग कर जनकल्याण का संकल्प लेते थे। गुरु शिष्य से दक्षिणा माँगता नहीं था। एक परम्परा थी, जिसका निर्वाह स्वेच्छा पूर्वक किया जाता था”।

रमन ने अपनी असहमति जताई, “लेकिन द्रोणाचार्य ने तो बड़ी कठोर गुरुदक्षिणा एकलव्य से माँगी थी”।

दादी ने उसे समझाते हुए कहा, “वह अकेला अपवाद है, जिसके पीछे राजनैतिक कारण छिपे थे। हाँ एक दो ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं, जहाँ निर्धन शिष्यों द्वारा बार-बार गुरुदक्षिणा के लिये आग्रह किये जाने पर क्रोधित गुरु ने परीक्षा लेने के लिये कठिन गुरुदक्षिणा मांगी थी”।

रमन ने उत्सुकता पूर्वक कहा, “मुझे ऐसी ही कोई कहानी सुनाओ”।

दादी ने कहा, “वर्षों पूर्व मैंने कवि कालिदास द्वारा रचित रघुवंश में महर्षि वरतन्तु और कौत्स का प्रसंग पढ़ा था”।

रमन ने प्रसन्न होकर कहा, “दादी याद करके वही सुना दो, मैं उसी पर अपनी एकांकी लिख लूँगा”।

रमन का उत्साह देखकर दादी ने कहना शुरू किया, “तो सुनो। वेद उपनिषद और समस्त विद्याओं के ज्ञाता महर्षि वरतन्तु का गुरुकुल नगर से दूर बड़े ही शान्त व सुरम्य वन में था। वहाँ देश के कोने-कोने से छात्र शिक्षा ग्रहण करने आते थे। महर्षि वरतन्तु के अनेक शिष्यों में कौत्स नाम का शिष्य था, जो ऋषि कुत्स का पुत्र था। ऋषि कुत्स स्वयं सामवेद के कई गीतों के रचयिता थे। कौत्स बहुत ही मेधावी, विनम्र और अनुशासित था। सीमाबद्ध समय में कौत्स ने चौदह विद्याओं में निपुणता प्राप्त कर ली। दीक्षान्त समारोह के पश्चात सभी शिष्य अपनी सामर्थ्य अनुसार महर्षि को उपहार देकर अपनी कृतज्ञता व्यक्त कर रहे थे। कौत्स का मन भी बड़ा व्याकुल था, वह भी अपने गुरु को कुछ अमूल्य भेंट करना चाहता था, लेकिन ऋषिपुत्र होने के कारण धनसम्पति से विहीन था।

गुरुदक्षिणाबहुत सोच-विचार के बाद उसने महर्षि से ही पूछ लिया – गुरुदेव मैं आपको गुरुदक्षिणा में क्या दूँ?

महर्षि ने उसे आशीर्वाद देते हुए कहा – तुम्हारी निष्ठापूर्वक मेरी सेवा ही तुम्हारी गुरुदक्षिणा है । जाओ और अपने नये जीवन का शुभारम्भ करो।

लेकिन कौत्स ने हठपूर्वक कहा – बिना गुरुदक्षिणा दिये मेरी विद्या सफल नही होगी।

उसके हठ से शान्त स्वभाव वाले महर्षि वरतन्तु को क्रोध आ गया। उन्होंने बड़ी कठोर गुरुदक्षिणा माँग ली – तुमने मुझसे चौदह विद्याएं ग्रहण की हैं, अतः प्रत्येक विद्या के लिये एक-एक करोड़ स्वर्णमुद्राएँ लाकर दो।

कौत्स ने तो स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि गुरुदेव इतनी बड़ी धनराशि माँग बैठेंगे। पर अब प्रश्न प्रतिष्ठा और वचन बद्धता का था”।

रमन ने उत्सुक होकर पूछा, “क्या कौत्स इतनी बड़ी धनराशि जुटा पाया?”

दादी ने हँसते हुए कहा, “यही तो उसकी परीक्षा थी। चिन्तित कौत्स ने इधर-उधर भ्रमण करके धनराशि जुटाने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली।

भ्रमण के दौरान किसी ने कहा – क्षुद्र नालों से प्यास बुझाने की अपेक्षा समुद्र के पास जाओ।

कौत्स ने पूछा – समुद्र कहाँ मिलेगा?

शुभचिंतक ने कहा – सम्राट रघु तुम्हारी प्यास बुझाने में समर्थ है”।

रमन ने जिज्ञासा प्रकट की, “सम्राट रघु कौन थे?”

दादी ने कहा, “सम्राट रघु इक्ष्वाकुवंशी अयोध्या नरेश दिलीप एवं सुदक्षिणा के पुत्र थे। वे बड़े ही प्रतापी, शौर्यवीर व महादानी थे। उनकी इसी लोकप्रियता के कारण ही उनके पश्चात इक्ष्वाकुवंश रघुवंश के नाम से प्रसिद्ध हुआ। श्रीरामचन्द्र के पितामह थे।

गुरुदक्षिणालेकिन कौत्स सम्राट रघु की अयोध्या नगरी में पहुंचकर बड़ा निराश हुआ। उसे पता चला की सम्राट रघु ने समस्त भूखण्ड पर एकछत्र राज्य स्थापित कर विश्वजित् यज्ञ किया और यज्ञ में अपनी सम्पूर्ण सम्पति दान कर दी है। यहाँ तक अपने व्यक्तिगत आभूषण और सोने-चाँदी के बर्तन भी दान कर दिये। वे एक निर्धन सामान्य व्यक्ति की तरह सादगी पूर्ण जीवन व्यतीत कर रहे थे। यह सुनकर कौत्स के कदम वापस लौटने लगे। तभी मस्तिष्क में विचार आया – जब इतनी दूर आया हूँ, तो इतने दानी-प्रतापी सम्राट से मिलता चलूँ।

कौत्स के आगमन का समाचार सुनकर राजा रघु ने उनका सम्मान करते हुए कहा – अहो भाग्य है कि आप जैसे तपोनिष्ठ एवं वेदज्ञ ब्रह्मचारी के आगमन से मेरी कुटिया पवित्र हो गई। तेजस्वी वरतन्तु महर्षि कुशल तो हैं? आश्रम में किसी प्रकार की असुविधा तो नहीं है?

सम्राट की विनम्रता से प्रभावित कौत्स ने कहा – राजन्! आप जैसे प्रतापी, प्रजावत्सल और धर्मज्ञ राजा के राज्य में अमंगल व अशुभ के लिये कोई स्थान नहीं है। महर्षि के नेतृत्व में गुरुकुल श्रेष्ठता के कई कीर्तिमान स्थापित कर चुका है। वहाँ कोई समस्या नहीं है।

सम्राट रघु के मस्तिष्क में विचार आया कि अगर आश्रम में सब कुशल है, तो ब्रह्मचारी का इतनी दूर चल कर आने का प्रयोजन क्या है?

अतः स्पष्ट रूप से सम्राट ने पूछा – ब्रह्मचारी! कृपया अपने आगमन का हेतु एवं मेरे योग्य सेवा बताये।

कौत्स ने संकोच के साथ कहा – राजन्, आपके दर्शनमात्र से मेरा मनोरथ पूरा हो गया। प्रस्थान की आज्ञा दीजिये।

रघु ने अनुरोध किया – ब्रह्मचारी अपना मनोरथ बताये।

कौत्स ने मिट्टी के पात्र, चटाई और आभूषणविहीन रघु को देखकर कहा – राजन्, पानी बरसाकर रिक्त हुए मेघों से चातकपक्षी भी पानी की याचना नहीं करता। दान की महिमा से प्रकाशित आपके मुखमण्डल को कुछ मांगकर लज्जित नहीं करना चाहता हूँ।

यह सुनकर रघु ने कहा – आप सेवक रघु के सामने खड़े हैं। मौन तोड़िये।

संकुचित कौत्स ने कहा – मुझे गुरुदक्षिणा चुकाने के लिये चौदह करोड़ स्वर्ण मुद्राओं की आवश्यकता है।

सम्राट रघु ने कहा – वेदोपनिषद में पारंगत तपस्वी गुरुदक्षिणा के लिये रघु के द्वार से निराश होकर अन्यत्र जाये, यह इक्ष्वाकुवंश में प्रथम कलंक होगा, जो मृत्यु तुल्य होगा। आप कुछ दिनों के लिये मेरी यज्ञशाला में आतिथ्य स्वीकार करें।

गुरुदक्षिणा की व्यवस्था करने के लिये सम्राट रघु ने अपने मंत्रीमण्डल के साथ मंत्रणा की। सभी ने एक स्वर में स्वीकार किया कि अधीनस्थ राजाओं से कर माँगना अनुचित होगा, क्योंकि उन्होंने अपना कर विश्वजित् यज्ञ के समय चुका दिया था। केवल कुबेर ने कर नहीं चुकाया है। अतः उनपर ही आक्रमण किया जाये।

सेनापति ने आदेश दिया – सेना सुबह-सुबह ही युद्ध के लिये प्रस्थान करेगी।

प्रातःकाल सेना के प्रस्थान के लिये शंखनाद हुआ। तभी प्रतिहारी दौड़ता हुआ आया – राजन्! अद्भुत घटना घटी। कोषागार में अचानक स्वर्ण मुद्राओं की वर्षा होने लगी।

Guru-dakshina

सेनापति व मंत्रीमंडल के साथ सम्राट रघु कोषागार पहुँचे। स्वर्ण मुद्राएँ देखकर रघु मन ही मन मुस्काये और कुबेर को धन्यवाद दिया। राजसभा में स्वर्गमुद्राओं का ढेर लगा दिया गया। कौत्स को ससम्मान बुलाकर कहा – ब्रह्मचारी! यह धन राशि आप ले जा सकते है।

कौत्स ने कहा – राजन्! चौदह करोड़ स्वर्णमुद्राएँ ही चाहिये। सन्यासी के लिए धन का क्या प्रयोजन?

राजा ने कहा – आपके लिये प्राप्त मुद्राओं को मैं अन्य किसी काम में लगा नहीं सकता हूँ।

सभा में विचित्र दृश्य उपस्थित था। कौत्स चौदह करोड़ से अधिक एक मुद्रा भी लेने को तैयार नहीं था। दूसरी तरफ राजा रघु एक मुद्रा भी अपने पास रखने को तैयार नहीं थे। दाता और याचक दोनों ही त्याग के उच्चतम शिखर पर विद्यमान थे। अंत में सभा में विद्यमान विद्वत्जनों का आग्रह मान कर कौत्स ने समस्त धनराशि ले जाकर अपने गुरु के चरणों में समर्पित कर दी”।

कहानी सुनकर रमन ने कहा, “धन्यवाद दादी। मैं इसी कहानी को अपनी एकांकी का आधार बनाऊँगा”।

शब्दार्थ:

  • एकांकी – एक अंक का नाटक
  • प्रजा वत्सल – प्रजा को अपने बच्चे के समान प्यार करने वाला
  • प्रतिहारी – द्वारपाल

नैतिक मूल्य:

इस लेखक की और रचनाएँ पढ़िये

गुरुदक्षिणा
Rate this post

Leave a Reply

Loading...