First published in November 2016


राहुल, अभय और शशांक, तीनों अपने अपने घर से दूर, शांतिनगर में रहकर एक बड़ी फर्म के एक प्लान्ट पर काम कर रहे थे। तीनों मैकेनिकल इंजीनियर थे। साथ काम करते करते तीनों की दोस्ती हुई, फिर तीनों एक ही फ्लैट किराये पर लेकर रहने लगे। वहाँ से एक कैब (गाड़ी) से साथ साथ प्लान्ट पर जाते। प्लान्ट पर जाते हुए रास्ते में एक ऐसी जगह आती, जहाँ आसपास का सारा कूड़ा डाल दिया जाता था। इस कूड़े पर गायें आकर मुँह मारती रहतीं। एक दिन इसी बात पर तीनों दोस्तों में चर्चा होने लगी।

राहुल बोला, “देखो यार! किसी ने इस गाय की पूजा की होगी, इसके माथे पर टीका है और सींगों में माला बँधी है।”

अभय बोला, “और अब यह बेचारी कूड़े में खाना ढूँढ रही है। ऐसी पूजा से क्या फायदा!”

शशांक बोला, “तो क्या पूजा करने वाला उसके साथ खाना पैक करके बांधेगा?”, उसके स्वर में व्यंग था।

राहुल बोला, “अभय ठीक कह रहा है। एक ओर तो लोग गाय को माता कहते हैं, दूसरी ओर कोई इस बात की फ़िक्र नहीं करता कि ये बेचारी सड़क पर क्या खाकर पेट भर रही हैं। जब तक ये दूध देने लायक रहती हैं, तब तक लोग इन्हें पालते हैं, फिर ऐसे आवारा भटकने को छोड़ देते हैं।”

gai hamari maata hai

अभय बोला, “यार, एक काम तो हम भी कर सकते हैं”। सबने पूछा “क्या?”, तो उसने सबको अपने मन की बात बताई। सबको लगा कि उसकी बात में दम है।

जिस फ्लैट में ये लोग रह रहे थे, उसके पिछवाड़े में प्लास्टिक के दो पुराने ड्रम पड़े थे, जो किसी समय में पानी रखने के काम आते होंगे। पर फिर इनमें दो तीन छेद हो जाने से ये पानी के लिए बेकार हो गए होंगे, इसीलिए मकान मालिक ने इन्हें यहाँ छोड़ दिया होगा। तीनों दोस्तों ने आरी लाकर इन दोनों ड्रम के ऊपर के हिस्से काटकर अलग कर दिए, और इन्हें नाँद का रूप दे दिया। फिर वे बाज़ार से गाय का चारा खरीद कर लाये। उन्होंने दो बैग में चारा भरकर रख लिया। अगले दिन प्लांट पर जाते समय इस चारे को अपने साथ कैब में रख लिया। गाड़ी की डिक्की में दोनों ड्रम भी रख लिए। हालाँकि इन दोनों ड्रम को रखने के लिए उन्हें ड्राईवर को राजी करने में थोड़ी परेशानी उठानी पड़ी। ड्रम के कारण डिक्की का दरवाजा भी खुला-सा रहा।

जब रास्ते में कूड़े वाली जगह आई, तब तीनों दोस्तों ने उतरकर सड़क के किनारे जहाँ कूड़ा पड़ा रहता था, वहाँ दोनों ड्रम थोड़ी थोड़ी दूरी पर रख दिए और बैग का चारा उन दोनों में पलट दिया। फिर तीनों उत्साही नौजवान अपने काम पर चले गए। जब शाम को वे लौटकर उसी रास्ते से निकले तो उन्होंने देखा कि आज गाय कूड़े में मुँह नहीं मार रही थीं, बल्कि ड्रम में से चारा खा रही थीं। तीनों के चेहरे पर एक विजय भरी मुस्कान आई और उन्होंने दोनों हाथ उठाकर एक दूसरे को ‘हाय फाय’ दिया। अब वे रोज सुबह जाते वक्त बैग में चारा लाते और इन ड्रम में डाल जाते।

आसपास से निकलते लोग कभी-कभी रूककर इनको देखने लगते। किसी किसी ने उनके काम की तारीफ़ भी की। कुछ लोग बजाय प्रशंसा करने के, कुछ नकारात्मक बातें भी कहते। ऐसा भी कहते कि उन्होंने बेकार का झंझट कर दिया है, चारा मिलने पर और ज्यादा मवेशी आने लगेंगे, वगैरह-वगैरह। पर सही काम करने वाले ऐसी बातों की फ़िक्र नहीं करते, बस अपने काम में लगे रहते हैं। उन तीनों को ख़ुशी थी कि उन्होंने छोटा सा ही सही, पर एक अच्छा काम किया है।

कुछ दिन बाद इन दोस्तों के मक़ान मालिक मिस्टर खंडेलवाल आये, किराया लेने के लिए। अपनी आदत के मुताबिक उन्होंने पूरे मकान का एक चक्कर लगाया। फिर पिछवाड़े में ड्रम न देखकर उन्होंने उनके बारे में पूछा। शशांक ने उन्हें गाय के चारे की सारी घटना सुना दी। सब सुनकर वे बहुत खुश हुए। जब तीनों दोस्तों ने उन्हें मकान का किराया दिया, तो मिस्टर खंडेलवाल ने उसमें से एक हजार रुपए उन्हें लौटाते हुए कहा, “ये रुपए गाय के चारे के लिए रख लो। तुम लोग जो अच्छा काम कर रहे हो, उसमें मेरा भी कुछ सहयोग हो जायगा”। दोस्तों ने सहर्ष उनकी बात मान ली।

फिर एक दिन इन दोस्तों को क्या सूझी कि उन्होंने चारा खाती हुई गायों का फोटो लिया, और अपने इस प्रयास को सोशल साइट्स पर डाल दिया। शायद इससे प्रेरणा लेकर और लोग भी ऐसा कोई कदम उठाएं। दूर कहीं से एक पुराना गाना सुनाई दे रहा था…

“ज्योत से ज्योत जलाते चलो, प्रेम की गंगा बहाते चलो”

शब्दार्थ:

  • नाँद – बड़ा सा बर्तन, जिसमें जानवर चारा खाते हैं
  • सहर्ष – ख़ुशी के साथ
Background music: John Stockton Slow Drag (Chris Zabriskie) / CC BY 4.0
गाय हमारी माता है
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