मुर्गे की लंबी बांग, चिड़ियों की चहचहाट, ठंडी हवा का झोंका, सभी को निद्रा से उठाने की कोशिश कर रहे थे। कुछ इन्हें सुन कर भी अनसुना करने की कोशिश में चादर खीच कर पुन: निद्रा की गोद में समाहित होने का उपक्रम कर रहे थे। कुछ उठ कर प्रकृतिक सौंदर्य के स्वर्णिम काल का आनंद ले रहे थे। राधाबाई बार–बार कोशिश करने पर भी उठ नहीं पा रही थी, शरीर का तिल–तिल अंग दर्द से टूट रहा था। हर एक हड्डी में अलग–अलग प्रकार की कसक थी, टीसन थी, जो हाथ–पैर हिलाने भी नहीं दे रही थी। मनोबल में बहुत सामर्थ्य होती है। यह शक्ति एक बार तो मुर्दे को भी खड़ा करने की शक्ति रखती है। बस इसी मनोबल का सहारा राधाबाई ने लिया। हाथ जोड़े ईश्वर को याद किया। हरे राम…हरे राम…हे राम और एक उस्वांस लेकर बैठ गई। “श्री राम रामेती रमानमे, सहस्रनाम तातुल्यम श्री राम नाम बरानवे”, आदत के अनुसार मुंह से निकला, माँ पृथ्वी का स्पर्श किया, वंदना की और बिछी हुई चादर समेट दी। आज तीन दिन हो गए लेटे–लेटे, ऐसे कैसे काम चलेगा। जीवन चलाने के लिए चलना भी पड़ेगा और उसे दाना–पानी देने के लिए हाथ–पैर तो चलाने ही पड़ेंगे, क्योंकि बिना काम किए कब तक भोजन प्राप्त कर सकता है।

जरूरी काम निबटा कर राधाबाई ने बचे हुए खिलौने टोकरी में सावधानी से सजाए और गाँव की ओर चल पड़ी क्योंकि वही उनकी रोजी–रोटी का साधन था। आश्रय तो मंदिर में मिल ही गया था, वहीं वह पड़ी रहती और जीवन के शेष होने की प्रतीक्षा करती रहती। यही बुढ़ापे का हश्र है जब जिंदगी जी नहीं जाती, ढोई जाती है।

आज राधाबाई आवाज नहीं दे पा रही थीं क्योंकि कमजोरी के कारण आवाज लय नहीं पकड़ पा रही थी। लेकिन बच्चे उनकी लाठी की आवाज से परिचित थे, जो उसकी आहट पाते ही घरों से निकल आए और अपनी किलकारियों और शैतानियों से गलियों को मुखरित करने लगे।

“बड़ी अम्माँ मुझे गूजरी दो”

“बड़ी अम्माँ मुझे हाथी, सफेद वाला”

“बड़ी माँ मुझे पंखों वाला घोडा चाहिए”

“मुझे वह लंबा सा सिपाही”

“मुझे चिड़िया…नहीं बिल्ली दो”

खिलौने की टोकरी उतारते ही बच्चों की फरमाइश शुरू हो जाती। बड़ी अम्माँ सबको उनकी पसंद का खिलौना देती जाती और किसी के गोल गुलाबी गालों को छू कर प्यार करती, किसी के काले घुँघराले बालों में हाथ फिरा कर, किसी को पीठ पर हाथ रख कर दुलारती तो किसी को चूम कर।

khilonewali

बच्चे इस बड़ी अम्माँ से बड़े खुश रहते क्योंकि वह उनके लिए खिलौने लाती, सब बच्चों की फरमाइश पूरी करती। सब बच्चे खिलौने ले चुके तो किसी ने एक छोटे से बच्चे को आगे करते हुए कहा, “बड़ी अम्माँ, यह तेरा चुनुआ है। कल ही शहर से आया है”। राधाबाई ने चौंक कर देखा – वह प्यारा सा गोलमटोल, काली आंखों और गुलाबी गालों वाला बच्चा था। वह इसके आगे कुछ न देख सकी क्योंकि आँखों में आँसू झिलमिलाने लगे थे, जिन्होंने दृष्टि को धुंधला कर दिया था। भावातिरेक के कारण गला भर आया, एक भी शब्द न बोल सकी। हाथ बढ़ा कर उसे थामना चाहा लेकिन बालक पीछे हट गया। राधाबाई ने उसे एक काला घोड़ा दिया तो उसने ले लिया लेकिन पास में खड़े बच्चे के हाथ में पंखों वाला घोड़ा था। वह उसे ललचाई नजरों से देख रहा था। राधाबाई ने पूछा, “क्या चाहिए”? उसने उड़ने वाले घोड़े की ओर इशारा किया। राधाबाई ने दूसरे बच्चे को कई खिलौने दिए लेकिन वह पंखों वाला घोड़ा देने को तैयार न हुआ। राधाबाई का दिल भर आया कि वह चुनुआ को उसका मन पसंद खिलौना न दे सकी क्योंकि वह एक ही था। उसने चुनुआ को दूसरे दिन वैसा ही घोड़ा देने का वादा किया। बहुत बुलाने पर भी बच्चा उसके पास न आया, आज वह बीमार होने के कारण साफ–सुथरी जो न थी।

राधाबाई बच्चे को प्यार करने की लालसा लिए वापस लौट आई। चुनुआ का प्यारा सा चेहरा उसकी आँखों के सामने से हट नहीं रहा था। वह बार–बार आँसू पोंछती हुई आगे बढ़ रही थी। मानसिक निर्बलता में तो आंसुओं का स्रोत वैसे ही खुल जाता है और जब शारीरिक दुर्बलता भी हो तो उनको उपयुक्त वातावरण भी मिल जाता है।

चुनुआ, उनके कलेजे का टुकड़ा, कितना छोटा था जब पहले देखा था। कोई नौ–दस महीने का रहा होगा जब सास–बहू के वाद–विवाद ने झगड़े का रूप ले लिया और इस झगड़े ने सास -बहू का ही नहीं, माँ–बेटे के संबंध को भी तोड़ कर रख दिया। पच्चीस–तीस साल का संबंध पल में टूट कर बिखर गया। ऐसी भीषण मान–सम्मान की आग लगी कि कोई झुकने को तैयार न हुआ। एक माँ अपने बेटे और बहू के लिए अपने ही घर से निकल गई। न बेटे ने रोका न बहू ने। एक बार जो कदम बाहर रखे तो चाह कर भी अंदर न रख सकी…आखिर वही क्यों पहल करे? क्या औरत है इसलिए…क्या निर्बल है इसलिए…क्या बूढ़ी है इसलिए…नहीं…नही…वह निर्बल और कमजोर नहीं।

एक बार घर छोड़ा तो पलट कर उधर देखा नहीं, जब खाली पड़ा था तब भी नहीं। बहू–बेटा घर छोड़ कर शहर चले गए थे। आज चुनुआ ने चार साल से नीरस पड़े जीवन में चिंगारी छोड़ दी थी। कुछ पाने की चाहत न थी, लेकिन एक बार कलेजे से लगा कर प्यार करने को दिल किया। यही तो चिराग है उसके वंश का। यही तो ब्याज है, जिसे वह कब से जी भर देखना व महसूस करना चाह रही थी। सुना था मूल से ब्याज प्यारी होती है, इसमें ऐसा सत्य है जिसे कोशिश के बाद भी झुठलाया नहीं जा सकता।

राधाबाई चलती जा रही थी, कब उसका चार साल से बना घर आ गया उसे पता ही नहीं चला। बुखार और थकान से शरीर टूट रहा था। वह गिर पड़ी, फिर हिम्मत कर अपनी चादर में लिपट गई। ज्वर का ज्वार जब कम हुआ तो आँखें खोली, अंधेरे में टटोल कर पानी पिया और बैठ गई। अंधकार में भी उन्हें चुनुआ की शक्ल साफ दिखाई दे रही थी। वह ललचाई नजरों से पंखों वाले घोड़े को देख रहा था। पता नहीं उन्हें कहाँ से इतनी शक्ति मिली की वे रात में ही तालाब की ओर चल पड़ी। मंदिर में पुजारी भी न थे कौन उन्हें रोकता। वह यंत्र चालित सी कार्य कर रही थी। मिट्टी लाकर उसे गूँथती रही, मलती रही। बुखार ने फिर ज़ोर मारा, शायद मलेरिया था जो रह–रह कर चढ़ रहा था। हाय री औरत! क्या कुछ सहन नहीं कर जाती, इतने दमन, शमन के बाद भी अपनी भावनाओं का दमन क्यों नहीं कर पाती।

राधाबाई को पसीना आया, शरीर कुछ हल्का हुआ, वह बैठ गई और पंखों वाला घोड़ा बनाने लगी। बहुत कोशिश की लेकिन ज्यादा अच्छा न बन सका, एक लंबी सांस ली और उसे अपनी छाती से लगा लिया, जैसे वह घोड़ा न होकर चुनुआ हो। संतोष की मुसकान उनके चेहरे पर आ गई। आंखे बंद कर ली कि कल यह खिलौना वह चुनुआ को देंगी तो वह कितना खुश होगा!

प्रात: पुजारी जी ने देखा कि राधाबाई तो अभी नहीं उठी, आवाज दी, फिर ऊपर लिपटी चादर खींची तो देखा राधाबाई मुसकरा रही थी….एक अमिट मुसकराहट उनके चेहरे पर खिल रही थी। स्थिर पुतलियाँ किसी को देखने की चाहत लिए खुली की खुली रह गई थीं।

शब्द – अर्थ

  • ज्वार – बुखार
  • यंत्र चालित – मशीन से चलने वाला
  • अमिट – जो मिट न सके
खिलौनेवाली
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