“आज फिर तुमने अपना होमवर्क पूरा नहीं किया। जितना किया है, उसमे भी कितनी गलतियाँ हैं! ध्यान कहाँ रहता है तुम्हारा? कितनी बार कहा है कि थोड़ा मन पढ़ाई में भी लगाओ। वरना अच्छे नंबर कैसे आएंगे? सबसे पिछड़ जाओगे”।

मिस कितना डांट रहीं हैं मुझे! कैसे समझाऊँ कि मैं कोशिश करता हूँ, लेकिन कुछ भी याद नहीं रहता? शब्द भी गलत लिख देता हूँ। प्रश्नों के उत्तर भी भूल जाता हूँ। थोड़ा लिखने के बाद दिमाग बिलकुल खाली हो जाता है। इसलिए होमवर्क आधा रह गया।

टन….टन…..टन…टन….टन….

आहा! छुट्टी कि घंटी बजी, अब तो मिस डांटना बंद करेंगी। जल्दी भागता हूँ बस की तरफ!

ठीक है आज अच्छे से सारा होमवर्क पूरा करके मिस को कल दिखा दूंगा! फिर तो वो खुश हो जाएंगी। इतना ज़्यादा डांटना ज़रूरी था क्या सब बच्चों के सामने? प्यार से भी तो समझा सकती थीं। हमेशा तो नहीं करता मैं ऐसा। कभी-कभी तो पूरा होमवर्क कर ही लेता हूँ।

घर में घुसते ही मम्मी पीछे पड़ जाती हैं, “स्कूल की यूनिफार्म बदलो, हाथ-मुँह धो लो, साबुन से हाथ धोए या नहीं? खाना ठंडा हो रहा है, टी वी के सामने से उठ जाओ, कितनी देर से देख रहे हो।” और भी न जाने क्या क्या।

मैं बच्चा हूँ क्या? क्यों ये बड़े लोग हमारे पीछे पड़े रहते हैं? हर वक्त देखो तो जैसे हमारे ऊपर ही नज़र है। कुछ भी छिपा नहीं रहता इनसे। सुबह जल्दी उठो, स्कूल भागो और फिर स्कूल में एक के बाद एक मिस आती जाती हैं – ये किताब निकालो, वो नोटबुक क्यों खुली है, उधर क्यों देख रहे हो, ब्लैकबोर्ड तो यहाँ है। हर मिस को यही लगता है कि उनका विषय हम सबसे अच्छे से पढ़ें। गणित, विज्ञान, अंग्रेज़ी, हिन्दी। इतना क्यों पढ़ाना चाहते हैं हमें? क्या होगा इतना पढ़ने से?

आज मैं बस में किसी से भी बात नहीं करूंगा। कितना मूड खराब हो गया।

अरे! ये नीचे धूल में क्या पड़ा हुआ है? ये तो एक डिब्बी है! इतनी प्यारी, सुंदर सी डिब्बी ज़रूर किसी बच्चे की गिरी होगी। ठीक है, कल स्कूल के खोया-पाया बॉक्स में जमा करा दूँगा। तब तक तो संभाल कर रखनी ही होगी। अब इसे उस बच्चे तक पहुँचाना मेरा कर्तव्य है।

बस में किसी बच्चे को नहीं दिखाता, वरना मांगने लगेंगे।

घर पहुँच कर अपने कमरे में ही जा कर देखूँगा। आज लग रहा है कि घर जल्दी से जल्दी पहुँच जाऊं।

“मम्मी! जल्दी से खाना दे दो, बहुत भूख लगी है। देखो मैंने यूनिफार्म भी बदल ली है और हाथ मुँह भी धो लिए हैं।” मम्मी भी खुश हो गईं हैं। उनको लग रहा है आज से मेरा बेटा बदल गया है।

“कुनाल! खाना खा लिया है तो, आकर थोड़ा रेस्ट करो। मैं भी थोड़ा पलक झपका लेती हूँ।”

“हाँ माँ! मैं कर रहा हूँ रेस्ट, यहीं अपने कमरे में।” कौन जाए उनके पास। क्या पता कुछ लेक्चर शुरू कर दें। यहीं रहता हूँ अपने कमरे में। बिस्तर में घुस जाता हूँ। मम्मी को लगेगा सो रहा हूँ।

अब देखता हूँ डिब्बी को आराम से। कितनी सुंदर, कितनी आकर्षक, कितनी जादुई सी लग रही है। ऐसे जैसे कि एक जिन्न बैठा हो अंदर। कितना मज़ा आए अगर सच में एक जिन्न निकल आए। अगर वो बोलेगा कि कुछ भी एक चीज़ मांगो तो मैं अपनी सबसे पसंदीदा चीज़ माँगूँगा। और जो उसने तीन चीज़ें मांगने को बोला तो मैं तीसरी पर माँगूँगा कि मुझे तीन चीज़ें और चाहिए।

मन भी न जाने क्या-क्या सोचने लगता है। चलो खोलता हूँ डिब्बी। ऐसा कुछ भी नहीं होगा जैसा सोच रहा हूँ।

अरे! ये धुएँ जैसा कैसे निकलने लगा। मम्मी अभी उठ कर आ जाएंगी, सोचेंगी ज़रूर मैंने कुछ जलाया है।

ये क्या दिख रहा है? ये क्या है? ये तो जिन्न जैसा लग रहा है! क्या ये जिन्न ही है! अरे हाँ! लगता है आज जो मैं सोचूंगा वही होगा।

“हा…हा…हा…हा…” जिन्न हंसने लगा।

“कौन हो तुम! कहाँ से आए हो! हंस क्यों रहे हो?”

“मैं इस डिब्बी का जिन्न हूँ। इस डिब्बी के अंदर सोता रहता हूँ। जो भी इस डिब्बी को खोलता है वो मेरा मालिक बन जाता है। हर बार खोलने पर मैं उसकी एक इच्छा पूरी करता हूँ। बोलो तुम्हें क्या चाहिए?”

“सिर्फ एक? तीन नहीं मांग सकता क्या?”

“नहीं!…और ज़रा जल्दी करो। इस डिब्बी से बाहर आने पर मेरी शक्ति कम होती जाती है। ज़्यादा देर करोगे तो तुम्हारी इच्छा पूरी नहीं कर पाऊँगा।“

“अच्छा! अच्छा! बोलता हूँ।”

क्या मांगू? क्या क्या सोचा था, कुछ भी याद क्यों नहीं आ रहा। कोई गेम, रिमोट कंट्रोल वाला हेलिकॉप्टर…नहीं नहीं…

“जल्दी करो कुनाल!” जिन्न फिर बोला।

अरे इसे मेरा नाम कैसे पता! खैर छोड़ो! जिन्न है ये इसे सब पता ही होगा।

“ठीक है जिन्न भाई….ऐसा करिए कि आप मुझे ऐसा कोई साथी दे दीजिये जो होमवर्क करने में मेरी मदद कर दे, मेरी हर मुश्किल में सहायता करे और मुझे डांट पड़े तो ये मुझे बचा भी ले।”

“बस इतनी सी बात। मेरे लिए ये बहुत छोटी सी चीज़ है। ये लो – एक रोबोट। ये होमवर्क करने में तुम्हारी मदद करेगा, एनसाइक्लोपीडिया के जैसे कोई भी प्रश्न का उत्तर ढूंढ कर बताएगा और किसी के डांटने पर तुम्हें बचाएगा भी।

अब मैं इस डिब्बी मैं जाता हूँ। मुझे नींद आ रही है। तुम ऊपर से इसका ढक्कन बंद कर देना जिससे कि मैं चैन से सो सकूँ।”

ये सब क्या हो रहा है? पहले डिब्बी का ढक्कन बंद करता हूँ।

क्या सच में ये रोबोट है? देखने में तो ये मेरे बराबर का एक लड़का ही लग रहा है। मम्मी पूछेंगी तो उन्हें क्या बताऊंगा? चलो छोड़ो, कह दूँगा दोस्त है, पास वाले घर में नया आया है। इसका नाम ‘करन’ बताऊंगा। चलो इसका टेस्ट लेकर देखता हूँ।

इससे सबसे मुश्किल सवाल पूछता हूँ। अभी पता चल जाएगा क्या सच है और क्या झूठ।

“बताओ युगोस्लाविया की राजधानी क्या है।”

प्रश्न पूरा भी नहीं हुआ था कि रोबोट बोला, “बेलग्रेड।”

अरे इसका सही उत्तर तो मैं भी नहीं जानता, चलो सही ही होगा।

“दूसरा प्रश्न – ६७८४ X २४३८ कितना होता है?”

रोबोट बोला, “१६,५३९,३९२”

अरे! ये तो सच में करामाती है। चलो इससे होमवर्क का पूछता हूँ। आज इंग्लिश में मिस ने जो कविता की कुछ पंक्तियों का अर्थ लिखने को दिया है, वो पूछता हूँ।

आहा! रोबोट का टेस्ट लेते लेते मेरा सारा होमवर्क पूरा हो गया।

अब मैं खेलने जा सकता हूँ। मम्मी को होमवर्क दिखाया। करन से भी मिलाया। मम्मी तो हैरान ही रह गईं। उनके चेहरे पर जो भाव आए उनको देख कर मुझे बहुत मज़ा आया।

अब मैं ज़्यादा देर खेल सकता हूँ। करन को साथ ले कर जाता हूँ, सबसे परिचय कराता हूँ।

आशीष, विक्रम, सुमित, और मनीष, सभी करन से मिल कर खुश हुए। उनको लगा चलो एक और सदस्य के आने से फुटबॉल का गेम अच्छे से होगा। तीन-तीन की टीम बन जाएगी और  मज़ा भी आएगा। करन को दूसरी टीम में रखा गया।

दस मिनट तो फुटबॉल ठीक चला, फिर मेरा ध्यान ज़रा हटा और दूसरी टीम ने गोल कर दिया। सुमित बहुत जी जान से खेलता है। उसने मेरी तरफ गुस्से से देखा और बोला, “तुम्हें पता है ये गोल कितना भारी पड़ेगा, हम हार जाएँगे, अब तक सब ठीक चल रहा था।” मैंने कहा, “सॉरी! अब ध्यान रखूँगा।” लेकिन उसका गुस्सा ठंडा नहीं हुआ, और तभी दूसरी टीम ने एक गोल और कर दिया।

मुझे करन को अपनी टीम में रखना चाहिए था। उसकी वजह से ही गोल हो रहे हैं। आखिर वो रोबोट है। इधर सुमित तो बहुत ही गुस्से में आ गया था, उसने मुझे भला-बुरा कहना शुरू कर दिया।

और तभी, करन हमारे पास आ गया और उसने सुमित को एक मुक्का मारा….. सुमित का गाल फूल गया…. और वो रोते हए अपने घर की तरफ भागा। भागते भागते बोला, “अब मैं तुम्हारे साथ कभी नहीं खेलूँगा”।

मैंने करन से पूछा, “तुमने ऐसा क्यों किया?”

तो वो बोला, “तुमने जिन्न से मांगा था न कि कोई तुम्हें डांटे तो मैं तुम्हें बचाऊँ, इसलिए।”

“पर ऐसे नहीं, वो मेरा मित्र है, अब वो दस दिन बात नहीं करेगा।”

“ऐसे, वैसे, कैसे…मैं ये सब नहीं जानता। कोई तुम्हें डाँटेगा, तो तुम्हें बचाना मेरा काम है! बस!”

ओहो! ये तो दोस्त ही छुड़ा देगा। ऐसा तो सोचा भी नहीं था। ये रोबोट है या मुसीबत? खैर, घर जाता हूँ, देर हो गयी है, सुमित को मना लूँगा कल तक।

घर के अंदर घुसा तो मम्मी की शक्ल देखते ही समझ गया बहुत गुस्से में हैं। लेकिन क्यों, मैंने तो सारे काम कर लिए थे न, अब क्या हुआ?

मम्मी गुस्से में बोली, “सुमित की मम्मी का फोन आया था।”

अच्छा! तो सुमित ने अपनी मम्मी से मेरी शिकायत कर दी। कितना खराब है, छोटा बच्चा है क्या? जाओ अब मैं भी नहीं बोलने वाला उससे।

“क्या बोले जा रहे हो? तुम से ये उम्मीद नहीं थी, पढ़ाई लिखाई में पीछे हो, अब लड़ाई-झगड़ा भी करने लगे। और ये दोस्त अभी भी घर नहीं गया?”

मम्मी का स्वर ऊंचा होने लगा था और उनकी आवाज़ में झुंझलाहट भी बढ़ने लगी थी, “लड़ाई ही करनी होती है तो खेलने क्यों जाते हो?”

अभी मम्मी ये सब कह ही रहीं थी की मैंने देखा मेरा रोबोट मम्मी की तरफ बढ़ा और उसने मम्मी को हवा में ऊपर उठा लिया!

“अरे! अरे! ये क्या कर रहे हो? छोड़ो मेरी मम्मी को! वो मुझे डांट नहीं रहीं हैं! वो तो रोज़ ऐसे ही बात करती हैं।”

मम्मी घबरा कर चिल्ला रहीं थी, “कुनाल! कुनाल! कुनाल!”

अचानक मेरी आँख खुल गयी मैंने देखा कि मैं बिस्तर पर हूँ और मम्मी कह रहीं है, “कुनाल! कुनाल! उठो कब तक सोए रहोगे? और ये क्या बड़बड़ा रहे हो? कोई सपना देख रहे हो क्या?”

मैंने बिस्तर में लेटे-लेटे एक गहरी साँस ली और खुद से बोला – “अच्छा हुआ ये सपना ही था, नहीं चाहिए कोई जिन्न, नहीं चाहिए कोई रोबोट! मैं अपने काम स्वयं ही कर लूँगा।”

शब्दार्थ:

  • कर्तव्य – ज़रूरी काम
  • एनसाइक्लोपीडिया – वह पुस्तक जिसमे विश्व भर कि सभी जानकारियाँ होती है
  • करामाती – जादुई

अंग्रेज़ी में पढे

Background music: Sunset (Kai Engel) / CC BY 4.0
कुनाल और जिन्न का करामाती रोबोट
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