क्या आप को बिना किसी कारण के गुस्सा आता है, चिड़चिड़ाहट होती है और बिना वजह आप उदास हो जाते हैं? कई बार छोटे भाई या बहन पर चिल्लाने लगते हैं, दरवाजा ज़ोर से बंद करते हैं या अपनी चीजों को ठोकर मारते हैं? आपको लगता है की कोई आपको समझता नहीं और प्यार नहीं करता। मम्मी-पापा के सदाचार और पढ़ाई के लिए दिये गए कभी न खत्म होने वाले उपदेशों की तरफ से कान बंद कर लेने का मन होता है। अगर आप ये सब अनुभव कर रहे हैं तो ये युवा होने की निशानी है और खुश खबरी ये है कि ये सभी युवा होते बच्चों के लिए एक बहुत ही सामान्य सी बात है।

सभी मनुष्यों के मन में बहुत सारे भाव आते हैं जैसे गुस्सा, ईर्ष्या, नफ़रत और प्यार। लेकिन खुशनुमा ज़िंदगी के लिए हम अपनी भावनाओं को नियंत्रण में रखना सीख जाते हैं। सरल शब्दों में, हम अपने गुस्से और आवेगों को इसलिए भी काबू में रखते हैं क्योंकि हम चाहते हैं कि सभी हमें प्यार करें और हमारी सराहना करें। क्या आप एक चिड़चिड़े, गुस्से वाले और सनकी इंसान को पसंद करेंगे? नहीं न? दूसरे शब्दों में, अपने दिमाग को संतुलित रखने के लिए और अपने वातावरण के साथ तालमेल बैठाने के लिए अपनी भावनाओं और मिजाज (मूड) को समझना और उन्हें नियंत्रण में रखना अत्यंत ही आवश्यक है।

ऐसा करने से पहले, इस विषय को और बेहतर रूप से समझने के लिए आइये कुछ वैज्ञानिक पहलुओं पर नज़र डालें।

शोध से यह पता चला है कि किशोरावस्था में मस्तिष्क बहुत ही प्रबल भावों को उत्पन्न करता है, किन्तु – प्रिफ़्रोंटल कॉर्टैक्स (prefrontal cortex) – मस्तिष्क का वो हिस्सा, जो इन भावनाओं को नियंत्रण में रखने के लिए ज़रूरी है, उसे विकसित होने में सबसे अधिक समय लगता है। तब तक किशोरावस्था का मस्तिष्क, अमिग्डाला (amygdala) नामक दिमाग के हिस्से पर निर्भर करता है, जो की आवेगों, गुस्से और सहज ज्ञान से संबन्धित है। और इसी कारण से किशोरों में मानसिक व्याकुलता और मूड के उतार चढ़ाव होते हैं।

क्या आप ये जानते हैं कि बच्चों के मस्तिष्क का विकास बचपन में अत्यधिक तेज़ी से होता है? ६ वर्ष की आयु तक उनके मस्तिष्क का विकास अपने वयस्क आकार का लगभग ९०-९५% हो जाता है।

हमारा मस्तिष्क तकरीबन बीस वर्ष की आयु तक विकसित होता है, लेकिन तब तक यह पुनर्निर्मित होने की प्रक्रिया से भी गुज़रता रहता है और यह प्रक्रिया किशोरावस्था के दौरान सबसे अधिक तेज़ी से होती है।

इस कारण से, किशोरावस्था एक तनावपूर्ण समय है। इसे ऐसे समझा जा सकता है जैसे कि एक चिड़िया का बच्चा अंडे को तोड़ कर बाहर निकलने कि कोशिश करता है, इस बड़ी और खूबसूरत दुनिया को जानने और समझने के लिए और अपनी एक अलग पहचान बनाने के लिए।

तो अगली बार जब आप खराब मूड में हों और परेशान, क्रोधित और विद्रोहात्मक हो रहे हों, तो याद रखें कि आपका मस्तिष्क बढ़ रहा है और विकसित होने कि प्रक्रिया में है।

अब जब आप ये जान चुके हैं कि मन के उतार चढ़ाव निश्चित हैं। प्रश्न ये उठता है – हम क्या कर सकते हैं? क्या हम अपने मूड को नियंत्रित कर सकते हैं? इसका जवाब हाँ है। इस मन के उतार चढ़ाव से बिना किसी को या अपने आप को नुकसान पहुंचाए बाहर निकला जा सकता है।

यहाँ कुछ आसान से उपाय दिये जा रहे हैं जो आपको अपने मूड को नियंत्रित करने में मदद करेंगे:

१. एक शांत जगह पर बैठें, अपनी आँखें बंद करें और कम से कम १५ की गिनती तक गहरी साँसें लें। गहरी साँस लेने से शांति का अनुभव होता है और हमारा मस्तिष्क सकारात्मक ऊर्जा पर केन्द्रित हो जाता है।  

२. अपने जॉगिंग के जूते पहनें और २० मिनट के लिए जॉग/टहलने के लिए निकल जाएँ। व्यायाम से हमारे शरीर में खुशी पैदा करने वाले हॉर्मोन्स निकलते हैं।

३. डायरी लिखें – रोज़ाना डायरी लिखना मन के भावों को निकालने का एक सरल और शांतिपूर्ण माध्यम है, खासतौर पर तब जब आपका मूड खराब होता है।  

४. अपनी पसंद का संगीत सुनें – ये आपके मूड को बेहतर बनाएगा।  

५. रोने का मन कर रहा है तो रोएँ – रोना अपने मन में दबी हुई भावनाओं को बाहर निकालने का एक बहुत ही स्वस्थ तरीका है।  

६. किसी विश्वसनीय को अपने मन की बातें बताएं – किसी दोस्त, अपने माता या पिता या किसी अंकल/आंटी को बताएं कि आप कैसा महसूस कर रहे हैं। बात करने से आपको अपनी उलझन का कुछ दूसरा हल भी मिल सकता है। भावनाओं को अभिव्यक्त करने और बोलने से मन भी शांत होता है।  

७. सभी प्रश्नों के उत्तर ढूंढने की कोशिश न करें। याद रखें कि उदासी और चिड़चिड़ापन सामान्य जीवन के लक्षण हैं। इसलिए अपने आप को तनाव में न रखें। मुस्कुराएँ और अपने आप से कहें, “सब ठीक है! मेरी मन:स्थिति जल्दी ही सुधर जाएगी।”  

ज़रूरी ये है कि अपने मन के भावों को पहचानें और उन्हें नियंत्रित रखने कि कोशिश करें, जिससे कि वे आपके व्यक्तित्व का हिस्सा न बन जाएँ। इसलिए एक समझदार किशोर की तरह अपनी भावनाओं को संभालें और एक खुशहाल और सुखद किशोरावस्था का आनंद उठाएँ।

अंग्रेज़ी में पढे

किशोरों की मानसिक स्थिति
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