आज आदित्य बहुत खुश था। आज वह अपने स्कूल में दौड़ प्रतियोगिता में प्रथम आया। इनाम का कप लेकर घर आया, तो सबने उसे खूब शाबाशी दी। यह सोच-सोचकर वह पुलकित हो रहा था कि अगले महीने होने वाले इंटर स्कूल स्पोर्ट्स में वह अपने विद्यालय का प्रतिनिधित्व करेगा। यह एक महीने का इंतज़ार उसे भारी लग रहा था। काश, टाइम ट्रैवलिंग मशीन होती तो वह सीधा एक महीने बाद के समय में पहुँच जाता।

शाम को आदित्य कोचिंग जाने के लिए घर से निकल रहा था, तो उसे बैग के साथ मोबाइल फ़ोन और ईयर प्लग उठाते देख मम्मी ने उसे डाँट लगाई।

“आदित्य! तुम्हारे पापा ने तुमसे कितनी बार कहा है कि सड़क पर इयर फ़ोन का इस्तेमाल मत किया करो। तुम्हें इतनी सी बात समझ में क्यों नहीं आती है कि इसमें खतरा हो सकता है”।

“अरे माँ! आप भी न! आपको क्या पता, कितना मज़ा आता है गाने सुनने में। पता ही नहीं लगता कि कोचिंग का रास्ता कब पास हो जाता है”।

पर मम्मी ने आँखें दिखाना बंद नहीं किया तो आदित्य ने इयर फोन जेब में रख लिया। घर से निकला, गली पार की तो उसने जेब से इयर फोन निकाला और उसे मोबाइल में लगाकर म्यूज़िक ऑन किया। इयर फोन कानों में लगाकर, जेब में हाथ डालकर मस्ती से आगे बढ़ा, यह सोचता हुआ कि कितना कूल लगता है ऐसे गाने सुनना। मम्मी तो बस बिना बात टोकाटाकी करती रहती हैं।

आदित्य गाने सुनता सुनता जाने किस दुनिया में खो गया। घर से कोचिंग के रास्ते में एक तीखा मोड़ पड़ता है, उसे पार करके वह दो चार कदम ही आगे बढ़ा था। उसी समय पीछे से एक गाड़ी आ रही थी। सुरक्षा की दृष्टि से गाड़ी चालक ने मुड़ने से पहले देर तक हॉर्न दिया। मोड़ पर मुड़ते ही उसने अपनी गाड़ी के बहुत करीब एक लड़के यानि आदित्य को देखा। इयर फोन की वजह से आदित्य ने हॉर्न की आवाज़ नहीं सुनी थी। गाड़ी और आदित्य के बीच बहुत कम दूरी रह गयी थी। गाड़ी चालक ने उसे बचाने के लिये तेजी से ब्रेक लगाये पर ब्रेक लगाते-लगाते भी आदित्य गाड़ी की चपेट में आ गया। वह गाड़ी से टकराकर, उछलकर सड़क पर दूर जा गिरा और गिरते ही बेहोश हो गया।

जब आदित्य को होश आया तो उसने अपने आप को अस्पताल में पाया। वह तेज़ दर्द से कराह रहा था। देखा, पास में मम्मी खड़ी थीं और वे रो रही थीं। उसके होश में आ जाने से उनके रोते हुए चेहरे पर भी एक ख़ुशी की लहर दौड़ गयी। उन्होंने नर्स से कहा कि डॉक्टर को बता दें कि आदित्य को होश आ गया है।

kitna cool lagta hai

तभी आदित्य के पापा वहाँ आये। उन्होंने बताया कि एक्स-रे की रिपोर्ट से पता चला है कि बाँए पैर की हड्डी टूट गयी है, और उसके लिए ऑपरेशन करना पड़ेगा। वह तो गाड़ी वाला भला आदमी था जो इसे उठाकर यहाँ ले आया। उसका कहना था कि उसने मोड़ पर हॉर्न दिया था जिसे आदित्य ने सुना नहीं। सुनता कैसे! कानों में तो इयर फोन लगे थे न। छोटी सी लापरवाही से इतनी बड़ी मुसीबत खड़ी हो गयी।

पापा ने जाने कितनी मुश्किल से ऑपरेशन के लिए पैसों का इंतज़ाम किया। आदित्य का ऑपरेशन हुआ। मम्मी घर और अस्पताल के बीच, और पापा घर, ऑफिस और अस्पताल के बीच जैसे पिसकर रह गए। बिस्तर पर लेटा लेटा आदित्य सोचता रहता कि उसकी छोटी सी गलती के कारण कितनी बड़ी बड़ी परेशानियाँ खड़ी हो गयीं। उसके ऑपरेशन पर जो खर्च हुआ, उसके लिए मम्मी पापा को जाने कौन कौन से खर्चों में कटौती करनी पड़ेगी। उसकी पढ़ाई का भी बहुत नुकसान हुआ। उसकी अनुपस्थिति के लिए तो स्कूल में मेडिकल दे दिया गया, लेकिन स्कूल और कोचिंग की इतनी लंबी छुट्टी हो जाने से उसे कोर्स कवर करने में कितनी दिक्कत होगी इसकी चिंता उसे सताती रहती। यही नहीं, वह जिस इंटर स्कूल स्पोर्ट्स के लिए इतना उत्साहित था, उसमें तो अब वह भाग ले ही नहीं पायेगा। थोड़ा ठीक होकर वह अपनी पढाई तो शुरू कर भी देगा, लेकिन भागने दौड़ने लायक होने में तो उसे लंबा वक्त लगेगा।

आदित्य जब अस्पताल में भर्ती था, तब एक नर्स उसका बहुत ख्याल रखती थी। लेकिन वह बिलकुल गुमसुम रहती थी। कभी किसी से बोलती चालती नहीं थी, बस चुपचाप अपना काम करती और चली जाती। डॉक्टर शर्मा ने बताया कि उसका नाम गायत्री कृष्णा है। गायत्री कृष्णा पहले बहुत खुशमिजाज़ नर्स थी। उसके आने से माहौल बड़ा खुशनुमा हो जाता था। उसकी जिंदगी में अचानक कुछ ऐसा घटा जो उसकी जिंदगी के सारे रंग छीन ले गया। हमेशा हँसती रहने वाली गायत्री कृष्णा एकदम गुमसुम सी हो गयी। दरअसल दो साल पहले उसका पन्द्रह साल का बेटा अपने तीन दोस्तों के साथ पिकनिक मनाने गया था। वहाँ एक पहाड़ी पर चारों दोस्त ‘सेल्फी’ लेने की कोशिश कर रहे थे। जोश में भरे जवान बच्चों ने थोड़ी और, थोड़ी और अच्छी सेल्फी लेने के चक्कर में सुरक्षा का ध्यान नहीं रखा। दो बच्चों का पैर फिसला और वे पत्थरों से टकराते हुए खाई में जा गिरे। उनके दोस्तों के देखते देखते दो कीमती जिंदगियाँ मिट्टी में मिल गयीं। इनमें से एक गायत्री कृष्णा का बेटा था। तबसे गायत्री कृष्णा एकदम खामोश सी हो गयी हैं।

आदित्य को बड़ा दुःख हुआ उनकी कहानी सुनकर। उसका मन हुआ कि वह गायत्री कृष्णा से कुछ बात करे, उनका दुःख बाँटे। पर वह ऐसा कुछ नहीं कर पाया। उसकी समझ में ही नहीं आया कि वह कहाँ से बात शुरू करे। उसे इस बात का डर भी था कि कहीं उनका दुःख बाँटने की कोशिश में वह उनके जख्म हरे न कर दे।

अब उसे इस बात का एहसास हो रहा था कि बच्चों की छोटी छोटी गलतियाँ, जिदें और लापरवाहियाँ बड़ों के लिए और उनके खुद के लिए भी कितनी भारी पड़ जाती हैं। आदित्य ने जीवन भर के लिए सीख ले ली। उसने निश्चय किया कि वह ऐसी नादानियाँ अब कभी नहीं करेगा और औरों को भी इस तरह के काम करने से रोकेगा जो उनके लिए मुसीबत का सबब बन सकते हैं।

कठिन शब्द

  • पुलकित – प्रसन्न और उत्साहित
  • सबब – कारण
  • जख्म हरे करना – दुःख की बातें याद आ जाना
कितना कूल लगता है
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