बुलबुल ने सीखा कि कामयाबी की अभिलाषा के साथ-साथ उसे अपनी हार को स्वीकार करना भी आना चाहिए। 

First published in March 2017


पिछले साल के खेल दिवस पर तो बुलबुल कुछ ख़ास कमाल नहीं कर पाई थी किन्तु इस बार उसने ठान ली थी कि सबसे अधिक पदक वही जीतेगी। उसने इस बार बहुत लगन और मेहनत से तैयारी की थी। उसे विश्वास ही नहीं यकीन भी था कि इस बार तो वह कामयाब होकर ही रहेगी।

कामयाबी की अभिलाषाइस साल के खेल दिवस का दिन आ गया। बुलबुल बहुत ही खुश थी। उसे डर भी लग रहा था और मन में उल्लास भी था इस बात का कि आज के दिन वह सबको दिखा देगी की वह किसी से कम नहीं। वह भी प्रथम आने के सक्षम है। वह अपने माता पिता को गौरवान्वित भी अनुभव करवाना चाहती थी।

बुलबुल के माँ बाप दोनों ही बुलबुल की इस खुशी में शामिल होने तथा उसका उत्साहवर्धन करने आये थे। जैसे ही वह दोनों अपनी – अपनी कुर्सी पर बैठे, बुलबुल का चेहरा खिल उठा। एक अलग सी मुस्कुराहट उसके चेहरे पर झलक आई। माँ ने जैसे ही उसे देखा, अपना हाथ उसकी तरफ हिलाया। बुलबुल ने भी अपना हाथ उन्हें देखकर ख़ुशी से हिलाया।

प्रतियोगिता शुरू हुई और साथ ही बुलबुल की धड़कने भी। पहली दौड़ शुरू होने जा ही रही थी कि बुलबुल ने भगवान् का नाम लिया। बुलबुल दौड़ी और ऐसा दौड़ी कि उसे कोई भी हरा नहीं पाया। पहला स्वर्ण पदक उसके नाम हुआ। ऐसे ही बाकी सारी दौड़ो में भी उसने कई पदक जीते – कभी स्वर्ण, कभी रजत तो कभी कांस्य। उसकी खुशी का तो ठिकाना ही नहीं था।

आखरी दौड़ की बारी आई। बुलबुल जानती थी कि यह दौड़ उसके लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि यही उसे उसकी मंज़िल की ओर ले जाएगी। दौड़ आरम्भ हुई – ‘एक, दो, तीन, शुरू’। बुलबुल दौड़ी अपनी पूरी ताकत के साथ, उसने अपने दौड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वह दौड़ी, दौड़ती गई। दौड़ समाप्त हुई और साथ ही बुलबुल की उम्मीदें भी। वह दौड़ हार गई थी । दौड़ की समाप्ति के साथ ही उसकी आँखे नम हो गई थी। वह दौड़ में कांस्य लाने में दो कदम से रह गई थी। वह सीधे एक कमरे की ओर गई और वहां अकेले में खूब फूट-फूट कर रोने लगी। माँ ने बुलबुल को कमरे की ओर जाते देखा तो दौड़ कर उसके पीछे गई। बुलबुल को रोता देख माँ की पलकें भी भीग गई। उन्होंने उसे गले से लगा लिया।

कामयाबी की अभिलाषा

जब बुलबुल सिसक रही थी तब माँ ने शांति से उससे कहा, “क्या यही है तुम्हारी हिम्मत? क्या मैंने तुम्हे यही सिखाया है कि जब तुम हार जाओ तो रोना शुरू कर दो? शायद मैं एक अच्छी माँ नहीं बन पायी”।

बुलबुल ने माँ की ओर देखा और अपना सिर ना में हिलाया।

माँ ने कहा, “नहीं ऐसा ही है। मैं तो समझती थी कि मैंने एक हिम्मती, साहसी बेटी को जन्म दिया है, परंतु मैं गलत थी। मेरी बच्ची तो कायर निकली”।

बुलबुल ने अपना सर फिर हिलाया।

माँ ने कहा, “यदि ऐसा नहीं है फिर तुम रो क्यों रही हो? अपनी हार स्वीकार करना सीखो। भले ही तुमने बहुत मेहनत की थी परंतु औरों ने भी तो पूरी तैयारी की होगी। पिछली बार तुम्हें तीन पदक मिले थे और इस बार तुमने पांच पदक जीते। क्या यह बात खुश होने की नहीं है? तुमने पहले से बेहतर किया है। हम धीरे-धीरे ही तो आगे बढ़ते हैं। क्या थॉमस एल्वा एडिसन ने एक बार में बल्ब का आविष्कार किया था? नहीं। उन्होंने हज़ार बार प्रयत्न किया तब जाकर आखिर में वह इसका अविष्कार कर पाए। तुम भी धीरे-धीरे सफलता की ओर बढ़ रही हो। एक बार में तो चींटी भी दीवार पर नहीं चढ़ पाती, हम तो इंसान हैं। इसलिए रो नहीं, अपितु इस बात का जश्न मनाओ की तुम पांच पदक जीती। अभी घर जाते वक्त हम इसकी ख़ुशी में आइस क्रीम खाते हुए भी जाएंगे, ठीक है?”

यह सुनकर बुलबुल थोड़ा मुस्कुराई। अब वह यह सोचकर संतुष्ट थी कि वह अगली बार और मेहनत करेगी और प्रयास करती रहेगी। अब उसने निश्चय कर लिया था कि एक दिन वह अपनी कामयाबी की अभिलाषा को पूरा करके ही रहेगी।

शब्द अर्थ:

  • गौरवान्वित – गर्व महसूस करना या करवाना
  • उत्साहवर्धन – उत्साह बढ़ाना
  • अभिलाषा – इच्छा

नैतिक मूल्य: 

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