धीरज ने रोहन को कलरीपायट्टु के बारे में बताया। 

धीरज ने रोहन से पूछा कि इस बार गर्मी कि छुट्टियों में वो क्या करने का प्लान कर रहा है। रोहन ने बोला कि उसका मार्शल आर्ट (युद्ध कला) सीखने का प्लान है। धीरज ने पूछा, “रोहन क्या तुम्हें ये पता है कि भारत में एक मार्शल आर्ट (युद्ध कला) शैली है जो सदियों पुरानी है?” रोहन को बहुत आश्चर्य हुआ और उसने धीरज को इसके बारे में उसे बताने के लिए कहा। धीरज ने जो रोहन को बताया वो इस प्रकार है।

इस युद्ध कला शैली का नाम कलरीपायट्टु है और ये इस धरती पर होने वाली युद्ध कलाओं में से सबसे पुरानी कलाओं में से एक मानी जाती है। इस युद्ध कला शैली का वर्णन वेदों में भी मिलता है।

ऐसा माना जाता है कि कलरीपायट्टु जो की भारत की सबसे लोकप्रिय युद्ध कला शैली है, अगस्त्य ऋषि और भगवान परशुराम द्वारा सिखाई जाती थी। बहुत सारी युद्ध कला तकनीक पिछले कुछ वर्षों में जानकारी की कमी के कारण, उचित दस्तावेज़ों और उपेक्षा के कारण खो गईं हैं। लेकिन कलरीपायट्टु ने अपनी पहचान को बरकरार रखा है। कलरीपायट्टु दो शब्दों के मेल से बना है – ‘कलारी’ और ‘पायट्टु’ जिनका अर्थ क्रमानुसार ‘प्रशिक्षण जमीन’ और ‘युद्ध’ है। इसलिए इसका शाब्दिक अर्थ है – ‘युद्ध की कला का अभ्यास’

प्राचीन समय में, सात वर्ष की आयु से ऊपर सभी बच्चों को इस युद्ध कला का प्रशिक्षण दिया जाता था और इसे धार्मिक प्रथाओं में भी शामिल किया गया था। कलरीपायट्टु का उल्लेख प्राचीन संगम साहित्य में भी मिलता है। १३ वीं सदी से १६ वीं सदी में विभिन्न राजवंशों के बीच युद्ध की बढ़ाई हुई अवधि के दौरान, इस युद्ध कला को लोकप्रियता हासिल हुई। इसका उत्पत्ति स्थान केरल माना जाता है, जबकि कुछ लोग पूरे दक्षिण भारत को इसका उत्पत्ति स्थान मानते हैं।

कलरीपायट्टु: एक प्राचीन भारतीय युद्ध कला शैली

ब्रिटिश शासन के दौरान प्रवासीय शासकों द्वारा इस कला को रोकने कि कोशिश की गई, लेकिन इस कला के प्रशंसकों ने, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों ने, छिपकर इसका अभ्यास किया। किन्तु आज़ादी के बाद सारे प्रतिबंध हटाये जाने से कलरीपायट्टु फिर से लोकप्रियता में आ गया और लगभग फैशन जैसा बन गया।

यह युद्ध कला सिर्फ युद्ध या हाथ पैर चलाने पर नहीं बल्कि शरीर की ऊर्जा प्रणाली को समझने पर केंद्रित है। यह युद्ध कला शैली मूल रूप से भारत में अधिक मात्रा में उपस्थित वन्य जीवन से, मुख्य रूप से बाघों से, अपने आप को बचाने के लिए शुरू की गई थी। इस शैली के बहुत सारे लय और आसन जानवरों की मुद्रा और उनकी ताकत से प्रेरित हैं और उनके नाम भी उन्हीं पर आधारित हैं। धीरे धीरे इस शैली का विकास जानवरों के साथ लड़ने के स्थान पर मनुष्यों के साथ लड़ने के लिए हो गया। शुरुआत में इस युद्ध कला की शैली में झुकने की मुद्रा का इस्तेमाल होता था, क्योंकि यह तकनीक जानवरों से लड़ने और उनसे छिपने के लिए इस्तेमाल होती थी । बाद में इस में खड़े होने वाले आसनों को अपनाया गया।

बाबा परशुराम की शैली में हथियारों के उपयोग का विकास हो गया जबकि ऋषि अगस्त्य की शैली में हाथों से लड़ना कायम रहा। यह युद्ध कला ‘कलारी’ नामक स्कूलों में सिखाई जाती थी जो अन्य विषयों और कला रूपों को सीखने के केंद्र भी थे। कलरीपायट्टु के सच्चे शिक्षार्थी १०७ ‘मर्मन’ की समझ रखते हैं जो शरीर के महत्वपूर्ण बिंदु हैं। यह ज्ञान ‘मर्म चिकित्सा’ यानि कि ‘मर्मन’ के इलाज के लिए प्रयोग किया जाता है।
ऐसा माना जाता है कि इस शैली को सही रूप से जानने वाले मात्र एक स्पर्श से किसी भी व्यक्ति को असमर्थ बना सकते हैं या उन्हें मार भी सकते हैं। इन महत्वपूर्ण बिन्दुओं और उनके महत्व के बारे में जानकारी चिकित्सा में भी इस्तेमाल होने लगी। विशेष औषधीय तेलों के साथ प्रशिक्षित कलारी

चिकित्सकों द्वारा की गई मालिश, काफी बीमारियों को दूर कर सकती है और शरीर का लचीलापन बढ़ाती है। यह युद्ध के दौरान आई मांसपेशियों की चोट का इलाज भी कर सकती है।

किसी भी दूसरी कला की तरह कलरीपायट्टु जानवरों की विभिन्न मुद्राओं और उनकी चाल पर आश्रित है और इनके नाम भी जानवरों के नाम पर आधारित हैं। अभ्यास में विभिन्न तकनीकों जैसे हमला करना, पैर चलाना, कुश्ती, हथियार चलाना और चिकित्सा के बारे में सीखना शामिल है। दक्षिण भारत के विभिन्न स्थानों पर और केरल में भी कलरीपायट्टु की विभिन्न शैलियाँ रही हैं। मुद्राओं के नाम, उनका उपयोग और उनकी व्याख्या अलग अलग जगह पर अलग है और सबका अपना अलग उपयोग है।

भारत में युद्ध कला, योग और नृत्य के बीच करीबी रिश्ता रहा है। कलरीपायट्टु का प्रभाव कथकली में दिखता है या इसका विपरीत भी सच हो सकता है। इसी प्रकार कलरीपायट्टु का योग से भी काफी लेन देन रहा है।

हालांकि इस बात का बहुत कम साहित्य मौजूद है, पर कलरीपायट्टु की उत्पत्ति और प्रसार ने चीन और तिब्बत की युद्ध कलाओं को भी प्रभावित किया है।

तो रोहन तुमने देखा कि, कलरीपायट्टु एक प्राचीन युद्ध कला है जो सैकड़ों वर्ष के बाद भी अपना अस्तित्व बनाए है और समय की कसौटी पर खरी उतरी है। यह कला जो महज जानवरों से अपने आप को बचाने के लिए शुरू हुई थी, एक कला का रूप बन गया जिसका इस्तेमाल उपचार के लिए भी किया जा रहा है। कलरीपायट्टु सिर्फ युद्ध कौशल के बारे में ही नहीं है, बल्कि यह एक महान कला है जो चिकित्सा, युद्ध और नृत्य का मेल है।

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