विवेक ने सीखा कि कर्मों का चमत्कार तभी होता है जब हमारे कर्म अच्छे हो। 


रात के १० बज चुके थे। विवेक अपनी परीक्षा की पढ़ाई कर रहा था। उसे पता था कि चाहे वह जितनी भी कोशिश कर ले, आज उसकी पढ़ाई ख़त्म नहीं होने वाली थी। उसे डर था कि वो कहीं परीक्षा में फेल न हो जाए। अगर ऐसा हुआ तो उसके माता पिता उससे बहुत नाखुश होंगे, यह उसे पता था।

कर्मों का चमत्कारअगली दिन परीक्षा से पहले उसने कुछ कठिन सवालों के जवाब एक छोटे से कागज़ पर लिख कर अपनी जेब में रख लिए। परीक्षा में जब उसने चुपके से सवाल देखने की कोशिश की, उसे उसी वक़्त पकड़ लिया गया। वह रोया, गिड़गिड़ाया, पर किसी ने उसकी एक न सुनी। उसी वक़्त उसे माता पिता को विद्यालय बुलाया गया।

जब वह पहुँचे, उन्हें प्रिंसिपल ने विवेक की हरकत के बारे में बताया। विवेक ने फ़िर रो कर समझाया कि वह डरा हुआ था, पर उस पर कोई यक़ीन नहीं कर रहा था। उसी दिन उसे स्कूल से निकाल दिया गया।

विवेक के घर का माहौल बड़ा ही तनाव भरा था। उसके माता पिता उससे बात नहीं कर रहे थे। उन्होंने कभी भी विवेक पर अव्वल आने के लिए दबाव नहीं डाला था, पर विवेक उन्हें निराश नहीं करना चाहता था। वह जानता था कि परीक्षा में नक़ल करने पर वह पकड़ा जा सकता है, तब भी उसने वह बेअकल तरकीब अपनाई। अब वह अपने कर्मों का फ़ल भुगत रहा था।

इस बात को थोड़े दिन गुज़र चुके थे और अब भी घर का माहौल गर्म था। विवेक के पिताजी उससे बहुत नाराज़ थे। वह बहुत मेहनत से विवेक को स्कूल भेज रहे थे, पर अब उन्होंने विवेक को दूसरा मौका देने से मन कर दिया। उन्होंने विवेक से कहा, “वैसे भी आगे जा कर तुझको ही दुकान संभालनी है। इसलिए अब स्कूल जाने की कोई ज़रुरत नहीं है। कल से दुकान पर आ जाना”।

विवेक को यह बात बहुत खटक रही थी। उसने अपनी पूरी ज़िंदगी दुकान पर नहीं गुजारनी थी। वह कुछ करना चाहता था। बड़ा आदमी बनना चाहता था। पर कैसे? अब तो वह पढ़ाई भी नहीं कर सकता था। उसके पास स्कूल जाने का कोई रास्ता नहीं था। वह हर रोज़ सोचता कि काश उसके साथ कोई चमत्कार हो। काश उसके माता पिता मान जाएँ और उसे माफ़ कर दें। काश वह फिर स्कूल जा सके। फ़िर उसने कहीं पढ़ा – जीवन में बस वही चमत्कार होते हैं जो हम अपने लिए रचते हैं।

तभी उसके प्रण लिया कि, वह अपनी ग़लती से सीखेगा।

वह अपने विद्यालय गया और अपने अध्यापक से मिला। विवेक ने उनसे कहा, “सर, में जानता हूँ कि मैंने गलती की है पर अब मैं उसे सुधारना चाहता हूँ। अब में फिर स्कूल आ नहीं सकता, पर क्या आप के पास कोई तरीका है जिस से में फ़िर पढ़ना शुरू कर सकता हूँ?”

विवेक के अध्यापक उससे अप्रसन्न थे, पर उन्हें पता था कि हर किसी को अपनी गलती सुधारने का मौका मिलना चाहिए। उन्होंने विवेक से कहा, “मैं खुश हूँ कि तुम्हें अपनी गलती का एहसास है। मैं तुम्हें पुस्तकें दे सकता हूँ। और तुम्हारे घर के पास एक नाइट स्कूल है, वह कोई शुल्क नहीं लेते। तुम वहाँ जा के पढ़ सकते हो। मैं पहले दिन तुम्हारे साथ चलूँगा”।

विवेक बहुत खुश था। उसने यह बात अपने माता पिता को नहीं बताई। वह हर सुबह दुकान पर बैठता और हर शाम स्कूल जाता। उसके माता पिता सोचते कि वह दोस्तों के साथ खेल रहा है। कभी अगर स्कूल से आते थोड़ी देर हो जाती, तो उसे बहुत डाँट पड़ती। वह उसे भी सेह लेता। अब उसका एक ही मकसद था – परीक्षा में अव्वल आना। वह पढ़ता रहा। जब कभी उसे कोई मुश्किल होती, वह अपने अध्यापक के पास चला जाता। वह उसकी झट से मदद कर देते। नाइट स्कूल में सारे छात्र उससे बड़े थे। कोई स्कूल जाने के लिए पैसे न होने के कारण यहाँ आया था, तो कोई सिर्फ अपनी पढ़ाई पूरी करने के सपने को अंजाम देने आया था। विवेक इन सब से बहुत प्रभावित हुआ और उसने डट कर मेहनत की।

Karmon ka chamatkar

देखते ही देखते साल की अंतिम परीक्षा का समय आ गया। इस बार विवेक डरा नहीं। उसे अपनी तैयारी पर विश्वास था। जब परीक्षा के परिणाम आए, तो विवेक का नाम उनमें अव्वल था। वह फटाफट घर गया और अपने माता पिता को नाइट स्कूल लेकर आया। पूरे रस्ते वह उससे पूछते रहे कि क्या बात हो गयी, पर विवेक ने उन्हीं कुछ नहीं बताया। स्कूल पहुँचने पर उसने उन्हें अपना नाम परिणाम कागज़ पर दिखाया। वह अचंभित हो गए। उन्हें अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था। विवेक ने उन्हें सारी कहानी बताई। उसकी बातें सुनते ही उन्होंने उसे गले लगा लिया।

विवेक ने सच में यह साबित कर दिया था कि कहानियों में चमत्कार हो सकते हैं, पर असल ज़िंदगी में हमारे अच्छे कर्म ही चमत्कार कहलाते हैं।

शब्दार्थ:

  • माहौल – वातावरण
  • अप्रसन्न – नाराज़
  • रचते – बनाना

नैतिक मूल्य:

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