हमारी लेखक को अपने बचपन की एक अद्भुत सी यात्रा आज भी याद है। 

First published in March 2016

यह यात्रा एक सच्ची घटना पर आधारित है।

मेरे पापा उत्तर प्रदेश मे सरकारी डाक्टर थे। सरकारी नौकरी की वजह से तबादला एक जगह से दूसरी जगह होता रहता था।ऐसे ही एक बार तबादले के दौरान हम सभी को नयी जगह पर जाना था। उस जगह के अस्पताल मे कोई डाक्टर नहीं था इसलिये पापा को जल्दी से जल्दी वहाँ पर पहुँचने को कहा गया। जिस जगह से हमको जाना था, वहाँ रेलगाड़ी की सुविधा नहीं थी और हमारे पास उस समय कार नहीं थी। कहीं आसपास जाना होता था तो हम सभी मोटर साइकिल से चले जाते थे। लेकिन जहाँ पर जाना था, वह करीबन तीन चार घंटे की दूरी पर थी, और बस सुबह ही चलती थी जो निकल चुकी थी।

पापा ने ड्राइवर के कहने पर ट्रक से जाने का फ़ैसला लिया। दोपहर के खाने के बाद ट्रक मे सामान के साथ-साथ मम्मी,पापा और दो छोटे भाइयों के साथ मेरी यात्रा शुरू हो गयी। उस समय मैंने कक्षा तीन की परीक्षा दी थी। हमारे साथ हमारी देखरेख करने वाले हरीराम काका भी थे। ड्राइवर की सीट के साथ मे तीन चार लोगों के बैठने की जगह होती है, वहाँ पर पापा, एक छोटा भाई, मम्मी और उनकी गोदी में सबसे छोटा भाई जो क़रीबन दो साल का था, सभी बैठ गये। उस सीट के ऊपर छोटी सी लेटने के लिये जगह बनी हुयी थी, मै वहाँ पर लेट गयी। ट्रक के ड्राइवर का साथी और हरीराम काका ऊपर चले गये। ट्रक में ड्राइविंग वाली जगह के ऊपर खुले में एक हिस्सा होता है, और उसके पीछे सामान रखने के लिये जगह होती है। वहाँ पर दोनो चले गये। मेरे लिये वह यात्रा बहुत ही मज़ेदार थी। पहली बार इस तरह की यात्रा कर रही थी ।

एक अद्भुत सी यात्रा

कुछ ही देर चलने के बाद ट्रक मे ख़राबी आ गयी। जिस वजह से एक घंटे का समय ठीक होने मे लगा और जब ट्रक चलने वाला हुआ तो मेरा बीच वाला भाई हरीराम काका के साथ ऊपर जाने की ज़िद करने लगा, पापा के मनाने पर भी न माना। उसका ऊपर जाना मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगा, ऐसा लग रहा था कि वह ज़्यादा मज़े करेगा। फिर थोड़ी दूर जाकर किसी ढाबे पर ड्राइवर ने चाय पीने के लिये रोक दिया। पापा का नये शहर मे रात होने से पहले पहुँचने का इरादा था। लेकिन इस तरह से दिन छिप गया और रात होने लगी। फिर ड्राइवर को कुछ ही देर में भूख लग आयी और आगे जा कर किसी और ढाबे पर रोक दी। मेरे लिये तो यह एक बढ़िया मौक़े से कम नहीं थी, जिसका मुझे इंतज़ार था कि कब मै खुली हवा में जाऊँ और रात मे चलते हुये ट्रक मे आसमान के तारों को देखूँ, पर मम्मी पापा को रात मे ट्रक के साथ चलना कुछ भा नहीं रहा था। 

ड्राइवर ने उस जगह पर रोका जहाँ पर बहुत सारे क़रीबन तीस चालीस ट्रक खड़े थे। सभी ड्राइवरों ने एक साथ ढाबे पर खाना खाया। मम्मी ने चलने से पहले रात का खाना साथ मे रख लिया था कि नयी जगह पहुँच कर खा लेंगे लेकिन देर होने की वजह से ट्रक मे ही खाना पड़ा। जब ट्रक चलने को तैयार हुआ तो पापा ने ड्राइवर से कहा कि सुबह के चार बजे निकलते है, क्योंकि उस रास्ते मे काफ़ी लूटपाट की वारदातें होती थी। ड्राइवर पापा की बात तो समझ गया था, लेकिन वह रूकने को तैयार नहीं था। उसने कहा साहब कानवाय के साथ जा रहे है और आप चिंता मत कीजिये, अगर कुछ होता है तो पहली गोली मेरे सीने मे लगेगी। पापा को न चाहते हुये भी चलना पड़ा, इसके अलावा और कोई चारा नहीं था, पर मेरे लिये तो बहुत ख़ुशी की बात थी कि मै खुले आसमान का नज़ारा ले सकूँगी। मेरी इस ज़िद के कारण ड्राइवर के साथी को दूसरे ट्रक मे जाना पड़ा, ऊपर मै, मेरा भाई और काका थे। मै ट्रक के चलते ही आसमान के तारे और खुली हवा का आनंद लेने लग गयी।

कुछ ही देर बाद बंदूक़ चलने की आवाज़ सुनाई दी, उसके बाद ट्रक भी रूक गया। हमारा ट्रक चौथे नम्बर पर था। चारों तरफ़ सन्नाटा था और गोलियों की आवाज़ आ रही थी। ड्राइवर ने बताया कि डकैतों ने घेर लिया है। पापा मम्मी ने अपने सोने के गहनों को रूमाल मे बाँध लिया और सोच रहे थे कि डकैतों के आने पर यह सभी गहने उनको सौंप देंगे, उनको विश्वास था कि हम सभी को कुछ नहीं होगा। इसी दौरान सभी ड्राइवर एक साथ इकट्ठे होकर सबसे पीछे वाले ट्रक से चुपचाप से वापस शहर की तरफ़ अपनी जान बचाकर भाग निकले। अब तो भगवान को याद करने के अलावा कुछ नहीं बचा था। मैंने शंकर भगवान को याद किया और मन मे ही कहा कि भगवान हमें  बचा लो।

गोलियाँ ऐसे लग रही थी मानो ऊपर से निकल रही है। कुछ देर बाद सभी डकैत लूटपाट मे लग गये। दूसरे ट्रक को लूट ही रहे थे, तभी फिर से गोलियों की आवाज़ आने लगी, क्योंकि पुलिस की जीप आ गयी थी। पुलिस वालों को सूचना ड्राइवरों ने दे दी थी, उनके आने पर सभी डकैत एक जगह पर इकट्ठा हो गये। मैंने जब हल्का सा उठकर देखा तो मुझको उनकी तरफ़ से थोड़ी रोशनी दिखाई दी, जैसे कि उनके हाथ मे टार्च थी और उनके पैर दिखाई दे रहे थे। आज भी वह दृश्य मेरे सामने आ जाता है और रोंगटे खड़े हो जाते। इतना देखकर मैं चुपचाप लेट गयी और छोटा भाई धीरे से तोलती आवाज़ मे बोला दीदी ये क्या हो ला रहा है? मैंने उससे कहा कि ज़ोर से मत बोलना नहीं तो चोर हमें पकड़कर ले जायेंगे, पता नहीं इतनी सी उम्र मे यह सब समझ कहाँ से थी। हरीराम काका का कुछ याद नहीं आ रहा है कि उन्होंने किस तरह से उस समय हम दोनो को सम्भाला था।

पुलिस और डकैतों दोनो तरफ़ से गोलियों की बौछार हो रही थी। फिर से मैंने उठ कर देखा, तो मुझे ऐसा लगा कि डकैत किसी को खींच कर ले जा रहे है। उसके बाद गोलियों की आवाज़ आना बंद हो गयी एवं किसी जीप की आवाज़ आयी और धीरे धीरे जीप की आवाज़ आना बंद हो गयी। फिर से चारों तरफ़ सन्नाटा था। पापा ट्रक से बाहर निकले और हमको नीचे उतार ही रहे थे तभी एक जीप आकर रूकी। हम सभी स्तब्ध रह गये! अब तो नहीं बचने वाले। जब उनकी तरफ़ देखा तो वे पुलिस वाले थे। उन्होंने हमें बताया कि फ़ायरिंग के दौरान डकैतों का एक साथी मारा गया, जिसकी वजह से लूटपाट बंद करके वे सभी वहाँ से कूच कर गये थे। यह सब सुनकर हम सभी बहुत ख़ुश हुये और थोड़ी देर मे ड्राइवर भी आ गया। लेकिन अब न तो मेरी और न ही मेरे भाई की हिम्मत पड़ रही थी ऊपर जाने की, सभी एक साथ नीचे बैठे रहे और कुछ ही देर मे नये शहर मे सुरक्षित पहुँच गये।

परन्तु मुझे आज तक यह समझ नहीं आता है कि हम बचे किस की वजह से…..क्या पापा मम्मी के विश्वास की वजह से, ड्राइवर की सूझबूझ से या फिर मैंने भगवान को याद किया था यह सब उसका नतीजा था। उस दिन के बाद से मेरी ईश्वर मे आस्था और बढ़ गयी थी। लेकिन एक बात तो तय है कि अगर कुछ ग़लत करते हो तो उसका परिणाम गलत होता है जैसे डकैतों के साथ हुआ उन्हे अपने एक साथी से हाथ धोना पड़ा।

यह कहानी मैंने अपनी याददाश्त के आधार पर लिखी है, काफ़ी हद तक घटना याद थी। कहीं कहीं पर श्रृंखलाओं को जोड़ने मे कठिनाई हो रही थी। वहाँ पर पापा की मदद ली है।

शब्दार्थ: 

  • कॉन्वॉय – काफिला
  • स्तब्ध –हैरान
  • श्रृंखलाओं – कड़ियाँ

नैतिक मूल्य:

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Background music: Sunset (Kai Engel) / CC BY 4.0
एक अदभुत सी यात्रा
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