रूप लता चौधरी होमिओपेथी चिकित्सक के रूप में बहुत मशहूर थी। होमियोपेथी चिकित्सा का मूल आधार है व्यक्ति की आदत स्वभाव को जानना। इसकी जड़ भारत से आरम्भ नहीं हुई थी। इसका मूल स्थान जर्मनी माना जाता है। लेकिन धीरे धीरे भारत में लोकप्रियता बढ़ती रही। वर्तमान में होमियोपैथी भारतीय चिकित्सा अध्ययन का मूल हिस्सा बन गया। जिन्हे रासायनिक पदार्थों से परेशानी होती है, उनके लिए होमियोपैथी दवाइयाँ मीठी मिठाई जैसी होती है।

डॉ रूप लता ने ब्याह नहीं किया। पहले अपने परिवार माता-पिता का ख्याल रखा। अब वो अकेली चिकित्सक कार्य में लगी रहती। ६२ वर्ष की होने पर उन्होंने २ घंटे का समय समाज सेवी चिकित्सा में लगाने पर विचार किया। उस दो घंटे में आने वाले गरीब ज़रूरतमंद लोगों से किसी प्रकार के पैसे ना लेने की घोषणा की। दवाइयां, विचार विमर्श सब डॉक्टर की तरफ से सुनिश्चित था।

उन दो घंटे में आने वाले मरीज़ो ने डॉ रूपलता को नया तज़ुर्बा दिया। पहली बार वो गरीबों के करीब आईं, उन्हें गहराई से जाना। इतनी मेहनत और परेशानियों के बाद भी सकारात्मक्ता। हर मरीज़ उन्हें नया ज्ञान दे रहा था।

एक दिन अंजुला काम वाली आई, बोली, “जी, डॉ साहिबा मैं तो ठीक हूँ। मेरे दो बच्चें है, बड़ी बेटी मनीषा और छोटा बेटा हर्ष। दोनों पढ़ने जाते हैं। ये बच्चें हमारी शादी के करीब दस साल बाद पैदा हुए। उनका पिता चाहता है, और मैं भी, कि दोनों अच्छी पढ़ाई करे। पढ़ाई के साथ शिक्षण कार्य हेतु एक अलग से अध्यापक को बुलाते हैं। लेकिन दोनों बेहद शैतान और उन्हें पढ़ने में खास दिलचस्पी नहीं है। मैं जानना चाह रही थी की क्या कोई ऐसी दवाई भी होती है जिससे बच्चों का दिमाग ठीक हो जाए? बात को समझने लगे? हमने इतना इंतज़ार किया, तब हमें बच्चों का सुख मिला। हमने इनके लिए पैसे जोड़े, लेकिन कोई सफलता नहीं मिल रही। डॉ साहिबा, दोनों बच्चों का दिमाग बहुत अच्छा है लेकिन पढ़ाई में क्यों नहीं लगता? मनीषा को तो बस नाचने को छोड़ दो। हर्ष भी सारा दिन पेड़ पर चढ़ना-कूदना, साइकिल पर कलाकारियां करना। उफ़! हम दोनो सारा दिन परेशान हो समझाते रहते है। चोट खाते रहते हैं फिर भी वही कुछ करते रहते है। पैसे सारे बर्बाद हो रहे है। अगर ये कामयाब नहीं हुए तो हमें कितना दुःख होगा। मैंने कई लोगों से सलाह ली, अब आपसे”।

Urja prayog

रूप लता ने हंस कर कहा, “अरे अंजुला! अगर ऐसी कोई दवा होती तो सारे बच्चें ही पढ़े लिखे होते। तुम एक बार मुझसे मिलवा दो। उनसे कहना कि तुम्हारी कुछ जांच होंगी, कैल्शियम आदि की। बस यही कह कर लाना। मैं जांच कर देखती हूँ यदि कोई समाधान हुआ तो”।

अगले दिन ही अंजुला मनीषा और हर्ष को ले कर डॉ से मिलवाने आ गई।

डॉ रूप लता ने परखा – दोनों बच्चें अच्छे स्वस्थ थे। शारीरिक तौर पर बेहद चुस्त। पता लग रहा था कि माता पिता द्वारा खाने पीने का पूरा ख्याल रखा जा रहा था। डॉ ने अपनी समझ से दोनों को परखा।

उनसे कहा, “देखो सामने सीढ़ियों से ऊपर छत पर जाओ और वहा से ये सामान ले आओ”।

दोनों बेहद तेज़ी से भाग कर छत पर गए और थोड़े समय में सारा सामान ले आये। इसी प्रकार कुछ और करवा डॉ रूप लता को जांच आधार मिलने लगा। डॉ ने उन्हें अच्छे स्वास्थ्य सम्बन्धी गोलियाँ दी। अंजुला को अगले दिन बुलाने का इशारा किया।

अगले दिन ही अंजुला आ गई।

डॉ रूपलता ने समझाया, “देखो बच्चें स्वस्थ कर्मठ और ज्ञानी है। लेकिन पढ़ाई में ध्यान केंद्रित ना करना, उत्तम परिणाम ना देने का मुख्या कारण है इनकी ऊर्जा या कार्यशक्ति का ना उपयोग हो रहा है ना उचित प्रयोग। इसका निवारण है, तुम्हे बेहद अच्छे परिणाम मिलेंगे। प्रयास कर देखो। यहाँ पास में स्टेडियम है, जिसमें सभी तरह के खेल होते है। तुम इनको वहाँ ले जाओ। ये किस खेल का स्वम चुनाव करेंगे, करने देना। एक बार इनकी ऊर्जा का सार्थक प्रयोग होगा, तो दिमाग शांत और समय का सदुपयोग कर पढ़ाई में भी ध्यान केंद्रित करेंगे”।

अंजुला बोली, “अरे डॉ साहिबा, इनके पिता को बेहद डर लगता है। वे स्वम् बच्चों हो विद्यालय छोड़ने जाते है और लाते है। वो इन्हे कही भी अकेले नहीं जाने देते। फिर वो अपनी नौकरी भी करते है, उनके पास समय ही नहीं है”।

डॉ बोली, “इस प्रकार की आदतों से ही समस्याओं को स्थाई स्थान मिलता है। एक बार ये शुरुआत होने से उसके डर का निवारण बच्चों को उचित मार्ग दर्शन तुम्हारी ज़िंदगी में बेहद सुकून मिलेगा। थोड़ी मेहनत और हिम्मत करो, तभी परिणाम मिलते है”।

अच्छे समझदारी से दोनों के बीच वार्ता समाप्त हो गई। उसके बाद डॉ साहिबा अपने कार्यो में लग गई।

करीब छह महीने बाद एक दिन अंजुला चमकता चेहरा लिए पूरे परिवार के साथ, फलों का थैला लिए आ गई। बच्चों ने भाग कर डॉ साहिबा के पैर छुए, पिता हाथ जोड़े खड़ा था।

अंजुला ख़ुशी से हंस हंस कर पूरी चर्चा कर रही थी, “डॉ साहिबा आपके समझाने के बाद इन्हे समझाया। जब हमारे बच्चें शारीरिक तौर से बेहद ऊर्जावान है तो उसका सदुपयोग खेल क्रिया से ही होगा। इनके मानने पर हम स्टेडियम गए। बच्चें तो उस इलाके को देख इतने खुश हो गए जैसे वास्तविक ज़िन्दगी पहली बार दिखी हो। मनीषा ने जुडो और हर्ष ने बैडमिंटन में भर्ती हो भाग लेना शुरू कर दिया। हम बराबर प्रशिक्षण से मिलते रहे। उन्होंने बताया – ऐसा लगता है ये बच्चें पैदायशी सक्षम है, इन्हे ईश्वर ने बेहद सक्षम गुणवान बनाया है। डॉ सहिंबा, यदि मैं आपसे ना मिलती, आपकी सलाह ना मानती तो आज ये सुख ना मिलता”।

उसी के साथ अंजुला ने दोनों के कई मैडल मेज़ पर रख दिए।

डॉ रूपलता बेहद खुश हो आश्चर्य से देखने लगी। दोनों के पास कई मैडल होने के साथ एक एक राष्ट्रीय स्टार का मैडल भी था।

शब्दार्थ:

  • सकारात्मकता – निश्चयात्मकता
  • तज़ुर्बा – अनुभव
ऊर्जा प्रयोग
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