Post Series: इला का ख्वाब

पैथान के निकट सौविग्राम नामक गाँव था, जो गोदावरी नदी के निकट था। वहाँ इला रहती थी। सूत के किसान होने के कारण, वहाँ के किसान संपन्न थे। यह समय कटाई का था। अतः सभी व्यस्त थे, क्योंकी कुछ समय बाद ही व्यापारी स्वर्ण-वस्तुओं के साथ आ जायेंगे और कपास के साथ अदला-बदली का व्यापार शुरू हो जाएगा। सभी व्यस्तता की चरम पर थे, किन्तु इला वहाँ नहीं थी। वह गोदावरी नदी के किनारे बैठी थी। 

“उफ़! में इन बातों से तंग आ गई हूँ!”

बारिश आने से पहले वाली उमस ने इला के अंदर चल रही उलझन को एक बाहरी वातावरण से जकड़ दिया। “क्या भविष्य है? बस इस साल की कमाई के बाद, बारह साल के बाद आने वाले पुष्करराज मेले की वजह से, ‘सिरनोहा’ के कपास किसान गोपालनन्दा के संग ब्याह सुनिश्चित है”

खूब घड़घड़ाहट के साथ हल्की फुहार शुरू हो गई। हल्की बूंदे शरीर को सहला रही थी पर मन को नहीं। भविष्य, आगे का जीवन, कहीं कोई उत्साह या आकर्षण नहीं था। हवा में तेज़ी आई, पर विचार थमे रहे।

तभी कुछ तरंगो के साथ, चप्पू के तालमेल से संगीत से भरी आवाज़ सुनाई दी। इला ने दूर तक फ़ैली गोदावरी पर नज़र डाली। हंस के मुख जैसी आकृति वाली ऊंची मज़बूत नौका बड़े वेग से आती दिखी। नौका पर एक हट्टा-कट्टा सशक्त युवक था, जिसके घुंघराले बाल थे और उसकी मज़बूत कदकाठी पर बारिश की फुहारें पड़ रहीं थीं। सोने के मोटे कुण्डल, कंठी और कड़ो वाले मज़बूत हाथों में बांस का चप्पू चलाता उसका तना हुआ शरीर था। इला सम्मोहित सी निहारती रही और नाव वेग से आगे बढ़ गयी। इला को अब सिर्फ उसका चट्टान जैसी पीठ पर पड़ती हुई फुहार दिखाई दे रही थी, फिर सिर्फ हंस नौका का पिछला हिस्सा।

ये क्या था? कोई सपना? या सपने को पूरा करने को दिखाया गया रास्ता?

कहीं ये राजा शुक्रदेव का पुत्र तो नहीं? सद्गुरु महाराज तो नहीं? अपने सीमित ज्ञान से उठे विचार, आश्चर्य और सुकून के मिले-जुले भाव के साथ, वो वापस आ गयी। 

उस समय को सुनिश्चित मान, प्रतिदिन इला के कदम गोदावरी की ओर बढ़ जाते। उसने आज पायल पहन ली। केश सज्जा, पुष्पसज्जा के साथ अंग वस्त्रो में रंग झलकने लगे। परिवार इस परिवर्तन को आश्चर्य चकित हो अपनी परियोजना की सफलता मान रहे थे। परिवार को ब्याह का उचित समय प्रतीत होने लगा। 

किन्तु सातवे दिन भी जब दूर दूर तक कोई नौका, सुदर्शन लौह पुरुष नहीं दिखा तो इला उसे सपना मान, केश पुष्पों की पंखुड़िया तोड़ने लगी। मायूस हो कर गोदावरी तट पर लहरो के उतार चढ़ाव से मन के उतार चढ़ाव को टकराने लगी। 

ये क्या था छलावा?

तभी उसे मुस्कुराते हंस की झलक दिखी, वही अद्भुद कद-काठी वाला युवक, घुंघराले बाल हवा में झूल रहे थे, मज़बूत वृक्ष सा शरीर। इला खड़ी हो कर, तेज़ी से भाग कर किनारे और चीख कर बोली, “प्रणाम!”

Ila Ka Khwaab - 1

युवक ने आश्चर्यचकित हो कर देखा और प्यारी मुस्कराहट के साथ बोला, “प्रणाम”

“क्या आप सातवे दिन आते है?”, इला ने पूछा

“हाँ। इसी समय सातवे दिन”, युवक बोला।

इला को पंद्रह साल में इतनी उत्तेजना कभी नहीं हुई थी। जैसे सातवा दिन नहीं सातवे आसमान पर उछाल दिया हो!

सातवा दिन; आज इला अपने पिटारे से नन्ही मणियो की माला, लटकन वाले बाजूबंद, ऊंची केशसज्जा जिसमे गज़रा लगा था, काजल की गहरी रेखा एवं कर्ण फूलो से सजा कर प्रस्थान किया। माँ ने इला के चेहरे पर आये अमित गुलाबी रंग और मन के भटकन वाले भावो को पढ़ लिया। उसने आश्चर्यचकित हो बेटी को निहारा मगर उसने टोका नहीं। इला ने मोदकम्, घुरघुट्टे और मेटकूट की पोटली बनाई और गोदावरी तट पर आ गई। बीस कदम पीछे उसकी माँ भी चल रही थी। 

यह स्थान अम्बीर बाबा द्वारा निर्मित था। ऊंचे वाट वृक्ष के नीचे पैर रखते ही ऋशि द्वारा दिए गई ध्यान-आध्यात्म का बोध होने लगता है। माँ ने देखा इला ने प्रणाम कर दिया जलाया। आध्यात्मिक मुद्रा में बैठते ही इला को जीवन के फैसले लेने के पूर्व की आत्मिक संतुष्टि का आभास हुआ। माँ ने देखा, मुस्कुराई और वापस चली गयी। 

आज समय से पूर्व मुस्कुराता हंस का चेहरा प्रकट हुआ। नाव की गति धीमी हुई वो किनारे आ गई। इला तीव्रता से उतर नीचे आ खड़ी हो गयी।

“प्रणाम” 

“प्रणाम”

दोनों ने हंस कर झुक कर एक दूसरे का स्वागत किया। 

“मेरा नाम इला है। मै कपास किसान नारायण की पुत्री हूँ” इला ने अपना परिचय दिया 

“मेरा नाम सत्यस्वरूप है। मेरे पिता का नाम सत्यानन्द है। हम प्रवरा ग्राम के रहने वाले है” सत्यस्वरूप बोला। “हम भी पूर्व में कपास की खेती ही करते थे। लेकिन मुझे बंधा हुआ जीवन नहीं भाया, अतः मैंने व्यापारिक शिक्षा ग्रहण कर स्वयं को मुक्त किया। अब मै प्रवरा से पूर्णा, मंजीरा, प्रणहिता मनेर, पेगंगा, साबरी, बसारा, धरमपुरी, मंथई व्यापार करने जाता हूँ”।

इला ने अपने जीवन में इतने नाम एवं स्थान कभी सुने ही नहीं थे। वो आश्चर्यचकित हो सुनती रही। 

क्या अंत लाएगी इला और सत्यस्वरूप की दोस्ती? कहानी का अगला भाग अगले महीने पढ़िये…

शब्दार्थ

  • चरम – अंतिम सीमा तक पहुँचा हुआ
  • वेग – गति
  • छलावा – लहर

अंग्रेज़ी में पढे

इला का ख्वाब – 1
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