Post Series: इला का ख्वाब

पिछले अंक में आपने पढ़ा कि इला एक अनोखे युवक से मिलती है, जिसकी दुनिया इला से बहुत अलग है। अब आगे पढ़िये।

“क्या तुम विवाहित हो?” इला ने पूछा।

“नहीं, और तुम?” सत्यस्वरूप ने भी पूछा। 

“नहीं”, इला बोली। 

सत्यस्वरूप प्रणाम की मुद्रा मे खड़ा हो गया, “मुझे समय पर पहुँचना आवश्यक है। मुझे सातवे दिन की प्रतीक्षा रहेगी”। 

सत्यस्वरूप गोल मोटे चांदी के कणों से सुसज्जित पैरों को स्थिरता से रख, नाव में सवार हो, विदा हो गया। 

सातवा दिन सत्यस्वरूप और इला ने अनुभव किया, जैसे वो एक दूसरे को बहुत दिनों से जानते हैं।

इला ने अपने मन के भाव प्रकट किये, “मुझे भी जीवन में नवीनता चाहिए। बंधन, एकस्वरता जीवन को समाप्त कर देती है। स्वाभाविक ज़िम्मेदारियाँ और उत्साहवर्धक जीवन जीना मेरी इच्छा है”। 

“हा! हा! हा! अरे इला! तुम सचमुच पूर्व की इला हो! इला, जब मैंने तुम्हे पहले दिन देखा था, तब ही तुम मुझे विशेष लगी थी। क्या तुमने वैवस्वता मनु की बेटी इला के बारे में सुना है?”

इला ने ना मुद्रा में मुँह हिलाया और आश्चर्य से देखने लगी। 

“इला मनु एवं श्रद्धा की सबसे बड़ी बेटी थी। माता-पिता की इच्छा पुत्र की थी। उन्होंने प्रार्थना/तपस्या कर ईश्वर को संतुष्ट कर आशीर्वाद लिया, जिसमे आहार विशेषज्ञ – मित्रा एवं वरुण – ने इला का लिंग परिवर्तन कर दिया। उसका नाम सुदुमयाना था। हर महीने लिंग परिवर्तन का प्रावधान था जिससे दोनों लिंगो की उच्चतम खूबियां उसमें पाई जाती थी”।

इला ने अद्भुद पौणारिक कथा सुनी, आश्चर्य चकित हो, बहुत प्रभावित हुई ।

“तुम्हारी रूचि आम औरतों से हट, उच्च एवं स्वाभाविक है। लोग इसे सिर्फ पुरुषों का अधिकार, इच्छा मान सहमत रहते हैं, किन्तु स्त्रियों के लिए नहीं।”

“आज की चकली, चरणामित्र, थालीपीठ और खर्बस, सभी बहुत स्वादिष्ट है”, सत्यस्वरूप बोला और विदा के मुद्रा में उठ, चला गया। 

कृपालनन्दा एवं गोपालनन्दा के आने की खबर से सारे परिवार में हलचल मच गयी। आँगन में गोबर का लेप, मुख्य द्वार के दोनों तरफ कलाकृतियों का पुनः निर्माण होने लगा। 

इला मौन भाव से सब देख रही थी। वह माँ से बोली,”माँ क्या गोपालनन्दा से ब्याह करना सुनिश्चित है?”

“कैसी बात कर रही हो? यह तो बाल्यावस्था में ही तय हो गया था। अब उचित समय एवं काल से सब उत्तम है। स्वयम को तैयार करो। उनका कपास का उत्पादन हमसे भी उत्तम है, अतः और भी सुख एवं समृद्धि से रहोगी”। 

“नहीं माँ मुझे कपास उत्पादन में कोई रूचि नहीं है।”

पीछे से आते पिता ने सुन लिया। “अच्छा तो किस उत्पादन में रूचि है? फल, फूल अनाज या सब्ज़ियाँ? हा! हा! हा!”, पिता ने हलके में आनंद लिया। 

किन्तु माँ ने पिता के हँसने में साथ ना दे कर ध्यान दिया। इला को माँ में स्त्री सशक्तिकरण की झलक दिखी।

“माँ, मुझे आपसे बात करनी है” इला बोली।

माँ और इला दोनों त्रम्ब्केश्वर प्रतिरूप घर में निर्मित स्थान में बैठ गईं। ईश्वर को नमस्कार कर, दोनों ने एक दूसरे को गंभीरता से लिया। 

“माँ, मैंने जन्म से जो जीवन जिया, उसे ही पुनः अपनाना, आगे बढ़ने के नहीं, पीछे जाने के सामान है। मुझे अगर जीवन निरर्थक लगा, तो मैं ना अपने पति-परिवार को प्यार और सम्मान दे सकूँगी, ना उनसे अपेक्षा रखूंगी। जीवन निरर्थक हो जाएगा!”, इला बोली।

माँ ने ना आज तक ऐसी बात सुनी थी, ना उम्मीद या आभास था कि परिवार को कैसे बताऊँ?

किन्तु पुत्री की बात गहराई से समझ उसे पूर्ण समर्थन दिया।

“क्यों न हम गुरु एकनाथ को संपर्क करे? कल उनसे मिलें? उनका आशीर्वाद पा, हम इस विषय पर चर्चा कर परामर्श प्राप्त करें। मुझे विश्वाश है कि वो सही मार्ग निर्देशन में सहायता करेंगे”, माँ सोचते हुए बोली।

अगली सुबह दोनों गाँव से बाहर आश्रम चल दी। 

“प्रणाम गुरु जी”, दोनो प्रणाम कर, आशिर्वाद पा बैठ गईं। गुरु जी मुस्कुराये और स्वागत कर, उन्हें चरणामृत एवं प्रसाद का प्रदान किया। 

सुनिश्चित वातावरण बनाने के बाद, माँ ने समस्त व्याख्यान को  संक्षिप्त कर कहा, “गुरु जी, कृपया बतायें – कोई कैसे अपने अनिश्चित भविष्य और जीवन के बारे में यकीन करें?”

गुरूजी मुस्कुराये और बोलें, “यह मनुष्य के विचार हैं जिनका हमारे जीवन में महत्व  है। विचार हमारे दिमाग की उत्पत्ति नहीं होती। उनका आधार शारीरिक शरीर ना हो कर, कहीं और होता है। जब ईश्वर ने सृष्टि की रचना की, समस्त प्राणियों के साथ-साथ अनेक विचारों की भी रचना हुई।  हर मनुष्य  किसी ख़ास विचार  से जुड़ाव महसूस करता है जो जागरूगता और ज्ञान पर निर्भर करता है।”

“लेकिन गुरूजी हम कैसे अपने विचारों के मूल्य का आंकलन करें? किस विचार को सही माने? किस को दूर करें?”, माँ ने पूछा।

वह पुनः मुस्कुराये और बोले, “हमें विश्वाश, जागरूगता एवं द्रढ़ता की पहचान होनी चाहिए। हम दोनों नेत्रों से सब देखते हैं और मूल्यांकन करते हैं। लेकिन एक नेत्रहीन मनुष्य विश्वाश का सहारा लेता है, उसी विश्वाश से उसे ईश्वरीय पवित्रता का पता चलता है। विश्वास का आधार  प्रेम और दृढ़ता  है।”

“शुद्ध नीयत, उद्देश्य, अभिप्राय हमारे अंदर दैवी पवित्रता पैदा करती है, जो जागरूगता और मोक्ष का रास्ता भी दिखाती हैं। इसी से दृढ़ता का समावेश हो, मनुष्य को शान्ति के साथ धनात्मक विचारों का मार्ग भी दिखाती है। यदि आत्म चेतना परिवर्तन को अपनाना चाहती है, तो वह सूचक है कि वह आत्मविश्वाश से ओत-प्रोत हो, उद्देश्य को पूरा करने का संकल्प पूर्ण विश्वाश से लेना चाहता है।” गुरु जी ने स्पष्ट किया। 

“जीवन बहुत सुन्दर है जब आप सही दिशा में चल रहे हों, उत्साह, जोश एवं उमंग के साथ। क्योंकि तब आपके जीवन का उद्देश्य सुनिश्चित होता है, जैसे जड़ ईश्वर से विकासशील ईश्वर उत्तम होता है।”

इसके साथ ही गुरु जी अपने आध्यात्म में लीन हो गए।

माँ ने नतमस्तक हो प्रणाम किया और इला को देखा। उसकी बंद आँखें, शांत अलौकिक चमक वाला चेहरा। उसे थपथपा कर चलने का इशारा किया। 

माँ ने फैसला ले लिया और इला के साथ घर की ओर प्रस्थान किया,  दृढ एवं सुनिश्चित कदमों के साथ।    

शब्दार्थ

  • नवीनता – नया अनुभव
  • प्रावधान – आयोजन
  • सशक्तिकरण – अधिकार प्रदान करना

 

Background music: NirvanaVEVO (Chris Zabriskie) / CC BY 4.0

अंग्रेज़ी में पढे

इला का ख्वाब – २
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