First published in December 2016 edition


चन्दन नगर का राजा चंद्रवर्मन् बड़ा ही लोकप्रिय राजा था। उसके राज्य में प्रजा बड़ी सुखी थी। चारों तरफ शान्ति थी। राजा हर समय प्रजा की भलाई के कार्यों में लगा रहता था। प्रजा के बीच में आपसी भाईचारा, मेलमिलाप और एकता थी। सभी जाति एवं वर्ग के लोग आपस में सौहार्द, सहयोग और सामंजस्य बनाकर अपनी अपनी शक्ति के अनुसार राज्य की प्रगति में योगदान दे रहे थे। ईर्ष्याद्वेष, वैमनस्य एवं विघटनकारी विचारधारा का प्रवेश राज्य की सीमा के भीतर मना था। इसलिए धनधान्य, ऐश्वर्यवैभव, सम्पन्नता एवं खुशहाली सबके आँगन में नाच रही थी।

एक दिन अचानक सबकी आँख बचाकर पड़ोसी राज्य  से ‘अहंकार’ नामक शत्रु उनके  राज्य में पता नहीं कैसे आ गया। धीरे-धीरे उसने अपने पैर फैलाने शुरू कर दिए। अब सबके मन में अहम् का जहर भर गया। सब एक दूसरे की आँखों में खटकने लगे। आपसी सौहार्द और सामाजिक सामंजस्य बिखरने लगा। एक दूसरे से अपने को बड़ा सिद्ध करने के लिए महाभारत आरम्भ हो गया। ब्राह्मण वर्ग ने शोर मचाया, “हम राज्य के असली कर्णधार हैं। दिनरात वेद-पुराणों के अध्ययन और चिन्तन मनन में अपना तन मन होम करके राज्य को सही शिक्षा और दिशा हम प्रदान करते हैं। अगर हम सबको विद्या दान ना करे, तो सब मूर्ख ही रह जायेंगे। पूजा पाठ, हवन, यज्ञादि से देवताओं को प्रसन्न कर राज्य को दैवी आपदाओं से बचाते हैं। अगर हम यह सब न करें, तो देश रसातल में चला जाएगा। अतः हम सर्वश्रेष्ठ हैं”।

क्षत्रिय वर्ग ने अपना तर्क दिया, “हम तरह तरह के शस्त्रों का कठिन प्रशिक्षण लेकर रातदिन राज्य की सीमाओं की सुरक्षा में तैनात रहते हैं। बाहरी शत्रुओं से राज्य की सुरक्षा करते हैं। अपने प्राणों की चिन्ता भी नहीं करते। इतिहास के पन्नों पर हमारे शौर्य और वीरता की कहानियाँ लिखी गई हैं। हमारी भुजाओं की शक्ति से राज्य स्वतंत्रता का सुख भोगता है। अगर हम ना होते, तो राज्य कब का पराधीन हो गया होता, इसलिए सर्वोत्तम तो हम हुए”।

किसान वर्ग ने विरोध का झण्डा गाड़ दिया, “राज्य के अन्नदाता तो हम लोग हैं। अगर हम अपना खून पसीना बहाकर अनाज न उगायें, तो सब भूखों मर जायेंगे। बिना भोजन राज्य कितने दिन बचेगा? भोजन तो जीवन की पहली आवश्यकता है। यह सच है कि सबके जीवन की रक्षा हमारे बिना नहीं हो सकती है, इसलिये पालनकर्ता को  श्रेष्ठता का सम्मान मिलना चाहिए”।

व्यापारी वर्ग ने तीखा प्रत्युत्तर दिया, “हम घर परिवार से दूर परदेश में जाकर धन कमाते हैं, जिससे राज्य की सम्पन्नता बढ़ती है। लोगों के लिए जरूरी चीजें उपलब्ध कराते हैं। अगर हम लोग व्यापार ना करें, तो राज्य की अर्थ व्यवस्था चरमरा जायेगी। अतः श्रेष्ठता का सम्मान हमें मिलना चाहिए”।

श्रमिक एवं सेवक वर्ग ने अपना स्वर ऊँचा किया, “सारी व्यवस्थाओं की नींव तो हम लोग हैं। अगर हम लोग अपनी सेवाएँ उचित तरीके एव समय पर न दें, तो सारी व्यवस्थाएँ मुँह के बल गिर जायेंगी। सब राजसी ठाठ-बाट, धर्मकर्म, खेतीबाड़ी और व्यापार चौपट हो जाएगा, क्योंकि सब काम करने के लिए हमारी ही आवश्यकता होगी। काम करने वाले  हम ही हैं। अतः श्रेष्ठता पर हमारा अधिकार होना चाहिए”।

सभी वर्गों के प्रतिनिधि अपने-अपने वर्ग की श्रेष्ठता के लिए लड़ते-लड़ते राजा के दरबार में पहुंचे। सबने बारी बारी से  अपनी बात राजा के सामने रखी और फैसला सुनाने को कहा। बुद्धिमान राजा को विद्रोह की आहट साफ सुनाई  पड़ी। तुरन्त उत्तर न देकर कहा, “आप सब की समस्या  बहुत ही गम्भीर है। मुझे सोच विचार के लिए कुछ वक्त  चाहिए। मैं सबकी सेवाओं और उनके महत्व पर गहन  विचार विमर्श करूँगा, जिससे किसी भी वर्ग के साथ  अन्याय एवं पक्षपात न हो। मैं अपना निर्णय चार दिन बाद  बताऊँगा”।

indra dhanush

चौथे दिन राजा की सूचना पाकर सभी नागरिक नगर के  बाहर खेल के मैदान में इकट्ठे हुए और परिणाम सुनने की  प्रतीक्षा करने लगे। सबके चेहरों पर आशा और निराशा के भाव उभरने लगे। पता नहीं राजा किसे श्रेष्ठ बताये? सभी  वर्ग के प्रतिनिधि अपने-अपने वर्ग के साथ आगे की रणनीति पर चुपचाप विचार करने लगे। थोड़ी देर के बाद मंच से  घोषणा की गयी, “राजा के आने में थोड़ी देर है। तब तक आप सब इस नाटक को देखकर अपना मनोरंजन कीजिए” । नाटक का नाम सुनते ही मैदान में शांति छा गई। सब नाटक देखने के लिए मंच की तरफ देखने लगे। नाटक शुरू हुआ, मंच पर एक काले कपड़े पहने व्यक्ति ने प्रवेश किया, “मैं काला रंग हूँ, सबसे ज्यादा शक्तिशाली हूँ। कोई मेरे आगे ठहर नहीं सकता। क्योंकि सभी रंगों के अस्तित्व को मिटाकर अपने में मिला लेने की मेरी अनोखी क्षमता है, जो किसी के पास नहीं है”।

तभी दौड़ता और हाँफता हुआ लाल रंग काले रंग को पीछे ढकेलता हुआ आया और बोला, “मैं राजस और सौभाग्य का प्रतीक लाल रंग हूँ। प्रत्येक सौभाग्यवती की माँग का सिन्दूर, माथे की बिन्दिया एवं पाँवों का महावर बनकर दमकता हूँ। मानव शरीर में जीवन बनकर दौड़ने वाला खून भी लाल रंग का होता है। प्रत्येक शुभकार्य, पूजा-अर्चना और शादी  ब्याह मेरे लाल रंग के बिना अधूरे हैं। प्रेम, सौंदर्य, ऐश्वर्य और वैभव का दूसरा नाम हूँ। मैं सुन्दरतम हूँ”।

हरा रंग उसे पीछे खदेड़ते हुआ आगे बढ़ा, “मैं सुख शांति और खुशहाली हूँ। समस्त प्रकृति में छाया हुआ हूँ। ये पेड़ पौधे मेरा ही रंग लेकर हरेभरे कहलाते हैं। मैं न रहूँ, तो……..”।

तभी नीले रंग ने आकर उसे चुप करा दिया और चिल्लाने लगा, “अरे! तू क्या बोलता है? देखना है तो मेरी व्यापकता देखो। नाप सको तो मेरा विस्तार नापो। आकाश ने मेरा रंग  ओढ़ा है। सागर ने भी मेरा रंग अपनाया है। मेरा कोई अन्त  नहीं है। इसलिये अनन्त हूँ। मेरी कोई सीमा नहीं, इसलिए  असीम हूँ। चारों ओर फैला हूँ, इसलिए व्यापक हूँ”।

पीला रंग बेचारा कुछ भी नहीं बोल पाया। सब आपस में लड़ने लगे। एक दूसरे के खून के प्यासे हो गये। युद्ध जैसा दृश्य नज़र आने लगा। तभी श्वेत रंग ने प्रवेश किया, “शान्ति! शान्ति! मेरे प्रिय भाइयों, शान्ति रखो और मेरी तरफ देखो! मैं सफेद रंग हूँ। मैं बहुत कमजोर हूँ। मेरा कोई अस्तित्व नहीं है। मैं किसी पर अपना अधिकार नहीं जमा सकता हूँ। ना हि ऐसा करने की चाह रखता हूँ। किन्तु प्रत्येक रंग के साथ मिलकर एक नये रंग को जन्म अवश्य दे देता हूँ। आप सब भी एक दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार कर लें और आपसी समायोजन के साथ नित्य नये रंगों को बनाकर एक इन्द्रधनुष का निर्माण कर सकते हो, जो मोहक होगा, सबके समान अस्तित्व का साक्षी होगा। न कोई  शक्तिशाली होगा, न कोई दुर्बल”।

रंगमंच पर इन्द्रधनुष उभरता है। खेल का मैदान तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठता है। सफेद वस्त्र पहने हुआ पात्र अपना मुखौटा उतार कर सामने आ जाता है। राजा को देखकर सब हैरान हो जाते हैं। राजा ने सम्बोधित किया, “मेरे प्रिय नागरिकों! आपने देखा, इन्द्रधनुष में सारे रंग मिलजुल कर कितने सुन्दर लग रहे हैं। ना कोई रंग छोटा, ना कोई रंग बड़ा। वैसे ही हमारे राज्य में ना कोई छोटा, ना कोई बड़ा है। सब एक दूसरे पर निर्भर हैं। एकदूसरे के बिना सब अधूरे हैं। कोई एक वर्ग राज्य चला ही नहीं सकता। तब छोटे-बड़े, श्रेष्ठता-लघुता का प्रश्न कैसा? यह प्रश्न खड़ा करने वाला हमारा सबसे बड़ा शत्रु अहंकार है, जो कहीं से आकर हमारे मनों में आ विराजा है। उसे निकाल फेंकिए। आपको  अपने प्रश्न का उत्तर मिल जायेगा”।

शब्दार्थ:

  • सौहार्द – मैत्रीभाव
  • सामंजस्य – संगति
  • समायोजन – समझौता

Background music: Behind Your Window (Kai Engel) / CC BY 4.0

इंद्रधनुष
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