First published in August 2017 edition

राजस्थान के गगोरान के पास एक बड़ा मशहूर राष्ट्रीय स्तर का इंजीनियरिंग विद्यालय था। जिसमे पूरे देश के छात्र बड़ी खुशी से दाखिला लेते थे। लेकिन दाखिला लेने के बाद उन्हें बड़ी निराशा होती थी। चार साल कैसे कटेंगे क्योंकि ना वहाँ कोई घूमने की जगह, ना अच्छे खाने पीने के भोजनालय, ना जिम जैसी कोई सुविधा। सुनसान राजस्थानी रेतीला इलाका था। ना हरियाली ना पानी। छात्रावास में पहुचने के बाद शुरुआत में सारे अजनबी से एक दूसरे को घूरते रहते है और समायोजन की व्यवस्था में गुम-सुम  से लगे रहते। कमाल की बात ये थी कि उस क्षेत्र का एक भी छात्र नहीं था।

एक हफ्ते बाद छात्र व्यवस्थित तो हो गए लेकिन निराशा वैसी ही रही। तभी विद्यालय से सूचना कार्यक्रम आया। जिसमे पढ़ाई से सम्बंधित समय सूचना का वर्णन था। अंत में नीचे निर्देशन हेतु सर्व प्रथम महाकक्ष में सभी को आमंत्रित किया गया था। सभी उदास से छात्र शाम को महाकक्ष में एकत्रित हो गए। सबके मन में एक ही भाव था। विद्यालय का स्तर ऊंचा है अतः भविष्य सुनिश्चित होगा लेकिन चार साल झेल कर मात्र पढ़ाई कर काटने पड़ेंगे।

दिग्विन्यास कार्यक्रम से सभा का आरम्भ हुआ। अध्यक्ष महाध्यक्ष प्रधानाचार्या आदि सभी विद्यालय के इतिहास सम्मानित उपलब्धियों छात्रों के भविष्य आदि की चर्चा करते रहे। छात्रों को तो सुनना ही था। कार्यक्रम का समापन होने से पहले उपाध्यक्ष जी ने भोजन के लिए वही आमंत्रित किया, परिचय करवाया और फिर सचिव से परिचय करवाया।

उन्होंने कहा, “ये हमारे और आपके दोनों के सचिव आनंद जी है। आनंद जी ने यही से पहले इंजीनियरिंग की फिर स्वयम प्रशासन/व्यवस्था का अध्ययन किया। तब से ये हमारे सचिव है। मैं आनंदजी को आमन्त्रित करता हूँ”।

आनंदजी ने नमस्कार कर सभी को संबोधित कर बोलना शुरू किया, “मैं इसी क्षेत्र का रहने वाला हूँ। यहीं से इंजिनीरिंग करी। करने के बाद मुझे अपना इलाका छोड़ कर बाहर नहीं जाना था और मैंने साथियों से उनकी परेशानियों का अनुभव किया। अंततः मैंने विचार किया कि मैं अपनी दोनों इच्छाओं  को पूरा कर सकता हूँ यदि यहाँ सचिव बन जाऊँ। सभी छात्रों आप अपने वरिष्ठ साथियों से जानकारी लीजियेगा। मैं आपकी हर समस्या के निवारण हेतु उपलब्ध हूँ। आपके प्रति पूर्ण रूप समर्पित हूँ। अतः निःसंकोच आप किसी भी समय मुझे संपर्क कर सकते है”।

Anand ka anandi swaroop

आनद जी की बात सुन कर छात्रों को बहुत राहत मिली। आनंदजी ने भोजन से पहले मनोरंजन कार्यक्रम के लिए सबको आमंत्रित किया। ढोलक थाप, मंजीरे वाले राजस्थानी संगीत के साथ वरिष्ठ साथियों ने अद्भुद नृत्य का आयोजन किया। यह नए छात्रों के स्वागत हेतु था। नए छात्रों को भी एक बड़े गोल घेरे में थिरकन के साथ संगीत ताल से घुमवाया। सभी नए छात्रों को अद्भुद खुशी का अनुभव हुआ।

अब पढ़ाई आरम्भ हुई। कुछ दिन में छात्रों ने आनंदजी को संपर्क किया – आनंदजी भोजन तो यहाँ ठीक बनता है। लेकिन हमें कभी कभी तो पिज़्ज़ा-बर्गर जैसे भोग की तलाब लगती है। इस सुनसान इलाके में यह कैसे संभव है?

आनंद ने कहा, “अरे सब कुछ तो यूट्यूब पर उपलब्ध है। हमारे रोज के खाने का जो बजट है वही रहेगा। लेकिन तुम ही स्वम् सीखो और भोजन बनाने वाले को सिखा कर बनवाओ। देखो कितना मज़ा आएगा”। सभी को नए विचार से बड़ी खुशी मिली।

इसी तरह एक बार सबने जिम सुविधा की इच्छा प्रकट की। उसका उपाय राजस्थानी दंगल के रूप में उभर कर आया। सभी को सच लगा कि जिम व्यवस्था तो सभी विकसित क्षेत्रों में आगे मिलेगी लेकिन राजथानी दंगल सीखने की कला और प्रयास तो यहीं मिलेगा। अतः सब सुबह शाम दंगल प्रशिक्षण में लग गए।

हर तरह चाहे पुस्तकों से सम्बंधित, भोजन, मनोरंजन, स्वच्छता, शोर शराबा, संपर्क, व्यवस्था आदि सभी समस्याओं का आनंद जी तुरंत समाधान दे देते थे ख़ुशी से। इससे भी ज़्यादा मानसिक और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का भी।

मानसिक मनोवैज्ञानिक समस्याओं के लिए वो एकांत में मिल कर ध्यान से पूरी बात सुन कर बेहद उचित सार्थक उपाय दे कर। हर छात्र का दिल जीत लेते थे। क्योंकि मात्र एक बार में हर समस्या का इतनी सरलता से निवारण हो सकता है, ऐसा किसी को उम्मीद नहीं होती थी। लेकिन सबके अनुभव ने उन्हें बेहद दुआएँ दी। हर एक को उनके ज्ञान अनुभव आदि से बेहद आश्चर्य होता था। यहाँ तक जो छात्र वहाँ से अध्ययन समाप्त कर नौकरी करने चले गए, वे भी समस्याओं के निवारण हेतु आनंद जी को संपर्क करते थे और बड़े आराम से निवारण मिल जाता था।

प्रत्येक दिन लंबी सैर के बाद आनंद जी एक घंटा संगीत और चुटकुलों में बिताते। बेहद ठंडा माहौल बनाये रखते थे। एक छात्र मयंक आरम्भ से उनके कार्यों और अनुभवों को बारीकी से जांच रहा था। उसने सोचा – अगर मैंने उनके ज्ञान के आधार का नहीं जाना तो क्या सीखा? अतः मुझे उनसे संपर्क कर मिलना चाहिए। वो सबके लिए इतना दिमाग लगा रहे हैं, सबको सम्पूर्ण राहत ख़ुशी दे रहे हैं, कैसे?

मयंक ने संपर्क किया। आनंद जी को भी ख़ुशी हुई। दोनों पास के एक तालाब तक टहलते चले गए और तालाब के किनारे बैठ बाते करने लगे।

आनंद ने कहा, “मैंने आज तक जो कुछ भी ज्ञान व्यवहार संस्कार सीखा है वो अपने दादा जी से। उन्होंने भी जैसे सीखा मुझे बता दिया। उनका मूल मन्त्र था – अनुभवी व्यक्ति ही सर्वोत्तम सुखी व्यक्ति और समस्या निवारक होते है। लेकिन छोटी उम्र में जल्दी अनुभव कैसे होगा? उसके लिए तो समय लगता है। फिर क्या फ़ायदा जब तुम ढेर सारी गलतियां करके दुःख उठा कर अनुभवी साबित हो। सारा जीवन तो ख़त्म हो गया। नई पीढ़ी बुज़ुर्गो की बात उतने ध्यान से मानती नहीं, क्योंकि उन्हें लगता है कि अब सब बदल गया है। नए विचारों के लिए पुराने अनुभवी व्यक्तियों को संपर्क करने से कोई लाभ नहीं। अतः, पुनः वही प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है। उसका एक ही उपाय है, तुम दूसरों के अनुभव से ज्ञानी बनो”।

“मैं बेहद ऊर्जावान एवं बुद्धिमान था, लेकिन बुद्धि एवम ऊर्जा दोनों का दुरूपयोग कर शैतानी में लगा रहता था। बिना जानने वाले के घर शादी मे जा कर खाना खा लेना।  किसी भी भी चीज़ इस्तेमाल कर लेना, किसी के वस्त्र पहन लेना आदि। लेकिन धीरे-धीरे मेरी बुद्धि ने मुझे अहसास कराया – मेरी छवि और मेरे भविष्य दोनों पर प्रश्न चिह्न लग गया है। मेरे दादाजी ही मेरे संरक्षक थे। उन्होंने मुझे कभी नहीं टोका। मैंने अपनी ऊर्जा और बुद्धि का पूरा प्रयोग कर भी सफलता नहीं पाई। बार बार मुझे हार माननी पड़ी। अंत में हार मान मैं दादाजी की शरण में गया और उनसे उपाय पूछा। तब दादाजी ने कहा – हार मान कर भी मनुष्य बहुत कुछ सीखता है लेकिन समय का दुरुपयोग भविष्य के लिए विनाशकारी होता है। अब तुमने जो समय बर्बाद किया है उसका इलाज है कि तुम वास्तविक सांसारिक ज्ञान हासिल करो छल कपट रहित। शादी ब्याह आदि में ना जा कर, मृत्यु रस्मों में जाओ। जैसे शोक सभा, तेरही आदि। शादी-ब्याह, तीज-त्यौहार में लोग सज-धज कर तैयार हो कर जाते है। उनका पूरा ध्यान स्वागत, सजावट, दिखावा, भोज इत्यादि में होता है। वहाँ वो भरपूर मस्ती के ख़याल से आते है। शोर शराबे की उम्मीद होती है। वार्तालाप का माहौल ही नहीं होता। उस कार्यक्रम को निबटा कर वापसी हो जाती है। लेकिन मृत्यु रस्म में ध्यान मृत्यु व्यक्ति पर होता है, उनके परिवार पर होता है। वहाँ वार्ता का विषय उनके सांसारिक कर्मों पर केंद्रित होता है। कोई उन्हें ज़्यादा करीब से जानता है तो वो उनसे सम्बंधित गहरे अनुभव की वार्ता करता है। हरेक अपने जीवन में हजारों समस्याओं का समाधान कर पाता है। लेकिन हमें ज्ञान कैसे होगा? हम हजारों पुस्तकें पढ़ लें, लेकिन वह याद रखना असंभव है। वास्तविक सांसारिक अनुभव हमेशा दिमाग में रहता है। दादाजी मुझे हमेशा ऐसे सम्मलेन में ज़रूर ले जाते थे। वहाँ विचित्र अनुभवों का आभास होता, विचित्र अनुभवों पर चर्चा होती। दिमाग बहुत हद्द तक खुल जाता, बहुत स्पष्टता आ जाती थी। जैसे किसी व्यक्ति पर चर्चा हुई की उसने अपने गिरते हुए व्यापार को कैसे सहारा दे कर बलशाली बनाया। किसी ने सैर सपाटे से सम्बंधित अनुभव। बताये किसी के गहरे पारिवारिक मसले सुलझ गए। नौकरी के सफल व्यक्तियों के अनुभव आदि। मैंने हजारों व्यक्तियों के मुख से जीवन के विचित्र अनुभव सुने और मनन रोकने वा किये, जिनका अब मैं प्रयोग कर रहा हूँ। इतनी हार के बाद मुझे उच्च ज्ञान मिला कि ऊर्जा और बुद्धि का सदुपयोग बिना जीवन में सफलता खुशी आनंद नहीं प्राप्त हो सकता। कुछ भी करो लेकिन लक्ष्य तो आनंद ही होता है। यह मेरे लिए भी अच्छा अनुभव है और पुराने दुष्कर्मो का प्रायश्चित भी”।

शब्दार्थ:

  • समायोजन – कोई चीज़ ठीक ढंग से रखना
  • निवारक – दूर करने या हटाने वाला
आनंद का आनंदी स्वरुप
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