आज अचानक आँखों को अपनी परोपकारी प्रवृत्ति की याद आ गई और वे पहले तो उन्माद से भर गई कि मैं कितनी महान हूँ… मैं सारे शरीर की रक्षा करती हूँ… पैरों को रास्ता देख कर कदम आगे बढ़ाने की…

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आँखों को उपहार
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