दस साल के आशीष को सारे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का बेहद जुनून था। अगर विद्यालय से आकर आराम करना है तो स्मार्ट फ़ोन हाथ में होता। यदि कही सफर में जाना है – कार, बस, ट्रेन, हवाईजहाज, किसी से भी जाना हो तो किंडल ले कर कहानियाँ पढ़ता रहता। गृह कार्य से सम्बंधित सभी काम लेपटॉप से निबटाना पसंद था।

यहाँ तक आशीष अपने छोटे भाई के नए इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों को भी खोल कर अंदर से जांच करने में रूचि रखता। उसे टी.वी. के पारिवारिक मनोरंजक कार्यक्रमों में रूचि नहीं थी। उसे टी.वी. मात्र वैज्ञानिक कार्यक्रमों के लिए उपयोगी लगता था। गर्मी या सर्दियों की छुट्टियों में सारे बच्चे मस्ती और खेलों में सारा दिन लगे रहते, लेकिन आशीष कम्प्यूटर से सम्बंधित कार्यक्रम वर्कशॉप में ही पूरी रूचि दिखाते। उन्हें छुट्टियों में कम्प्यूटर के साथ समय बिताने का पूरा मौक़ा मिलता।

सभी पारिवारिक सदस्य हट-प्रद हो कर आपस में चर्चा करते रहते थे – आशीष को किसी भी चीज़ से प्रेम नहीं मात्र इलेक्ट्रॉनिक पदार्थों से। तो क्या ये बड़ा हो कर ये वैज्ञानिक बनेगा? क्या बड़ा हो कर ये इलेक्ट्रॉनिक की दुकान खोलेगा? इलेक्ट्रॉनिक से जुड़े पेशे को अपनाएगा?

तभी माँ ने महसूस किया – जिस दुकान पर वह जाती थी, वहाँ पिता के साथ उसका बेटा जगत मदद हेतु मिलता था। ख़ास तौर पर हिसाब करने का काम। उस दूकान पर सभी सामान मिलते थे। दुकान अच्छी लेकिन पुराने जमाने की थी। अतः हिसाब जोड़ने के लिए दिमाग का इस्तेमाल होता था जगत का।

कोई २० या ४० विभिन्न प्रकार के उत्पादक भी लेता था तो जगत परचा बना कर १ मिनट में जोड़ कर सही जानकारी दे देता था। यदि कोई पुरानी चीज़ वापस कर नई बदलने भी आता, तो दोनों काम-घटाना जोड़ना एक साथ कर सही मूल्य बता देता था। खरीदार की सूची अनुसार जब तक सामान उसके बहुत पहले जोड़ कर जाता।

Asli software

    माँ के ज्ञान चक्षु खुले। उत्पादक में इतनी विभिन्नताएं होने के बाद भी इसके दिमाक में हज़ारों मूल्य वज़न के हिसाब से जोड़ आदि कैसे रह सकता है। वो भी कम्प्यूटर की तरह तेज़ी के साथ।

तब माँ ने आशीष को जगत से मिलवाया। मिलने आंकलन करने के बाद जगत ने चर्चा की, “मैंने भी विद्यालय में जब पहली बार एक साल तक कम्प्यूटर शिक्षा ली। तब सबसे ज़्यादा मेरा दिमाग सॉफ्टवेयर में ही लगा। विधिअनुसार सारी जानकारियों को संरक्षित करना आवश्यक है। मेरे पिता के पास ऐसी कोई मशीन नहीं थी। तो स्वम् मैंने उत्पादकों के साथ उनके मूल्य को लगा दिमाग में स्थित कर लिया। अपने दिमाग को कम्प्यूटर बना अपना पैसे लेन-देन का पेशा बना लिया। साथ ही वित्तीय वर्ष का आंकलन कर कर मूल्य का विवरण भी तैयार कर लेता हूँ। असली ‘सॉफ्टवेयर’ दिमाग में होता है”।

माँ ने सलाह दी, “आशीष, तुम बनी बनाई चीजों का मात्र फायदा उठा रहे हो। उससे सीख कर कुछ नया करोगे तब वैज्ञानिक श्रेणी में आओगे। अभी तो तुम्हारी उम्र सीखने की ही है। लेकिन जगत का उदाहरण अद्भुद है जिसने सीख कर अपने लिए नवोद्पाद कर जीवन और पेशा चुन लिया”।

शब्दार्थ:

  • नवोत्पाद – नवीनी करण
  • ज्ञान चक्षु – दिमाग के आँख
असली सॉफ्टवेयर
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